भारत में मुसलमानों की जनसंख्या लगभग 16 प्रतिशत के आसपास है।
भारत में मुसलमानों की जनसंख्या लगभग 16 प्रतिशत के आसपास है। इसके बावजूद, यदि पूरे देश में सर्वेक्षण किया जाए तो अतिक्रमण से जुड़े मामलों में उनकी संख्या लगभग 50 प्रतिशत तक बताई जाती है। आतंकवाद से संबंधित मामलों में यह अनुपात 90–95 प्रतिशत तक बताया जाता है। सार्वजनिक व्यवहार में बल प्रयोग करने वालों में भी उनकी भागीदारी लगभग 40 प्रतिशत के आसपास मानी जाती है। अन्य प्रकार के अपराधों में भी उनकी संख्या अपेक्षाकृत अधिक बताई जाती है। इसी प्रकार, दूसरे धर्म की महिलाओं को आकर्षित कर उनके साथ शारीरिक संबंध बनाने के मामलों में भी उनकी भागीदारी 70 प्रतिशत से कम नहीं बताई जाती।
ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि दुनिया भर में इस प्रकार की समाज-विरोधी गतिविधियों में मुसलमानों की भागीदारी अधिक क्यों दिखाई देती है। यह एक गंभीर विचारणीय विषय है कि भारत में उनकी जनसंख्या कम होने के बावजूद अपराधों में उनका प्रतिशत अधिक क्यों प्रतीत होता है। इसके साथ-साथ सामाजिक मर्यादाओं के उल्लंघन से जुड़े मामलों में भी उनकी संख्या अधिक बताई जाती है।
आज भी यह तर्क दिया जाता है कि अवैध निर्माण हटाने के दौरान मस्जिदों पर ही कार्रवाई क्यों होती है, जेलों में मुसलमानों की संख्या अधिक क्यों है, समाज में उनके प्रति अविश्वास क्यों बढ़ रहा है, और भोजन में थूक मिलाने जैसे मामलों में अक्सर मुसलमान ही क्यों पकड़े जाते हैं। यह भी एक विचित्र तर्क माना जाता है कि अतिक्रमण कोई करे और कार्रवाई किसी और पर हो।
इसलिए यह निवेदन किया जाता है कि भावनात्मक प्रतिक्रिया या प्रश्न उठाने के बजाय गंभीरता से यह विचार किया जाए कि इन प्रकार के अपराधों और गतिविधियों में मुसलमानों की भागीदारी अधिक क्यों दिखाई देती है, और इसके पीछे वास्तविक कारण क्या हैं।
Comments