9 जनवरी प्रातःकालीन सत्र : नई समाज व्यवस्था पर चर्चा
9 जनवरी प्रातःकालीन सत्र : नई समाज व्यवस्था पर चर्चा
भारत में समाज को छिन्न-भिन्न करने के लिए धर्म, जाति, लिंग और उम्र का व्यापक उपयोग किया जाता रहा है। इस विषय पर हम पिछले कई दिनों से निरंतर चर्चा कर रहे हैं। इसी क्रम में भाषा का प्रश्न भी सामने आता है। नेहरू परिवार ने भाषावार प्रांतों की रचना करके समाज विभाजन की नींव रखी। अब इसी गलत नींव पर जो ढांचा खड़ा हुआ है, वह पूरे देश में भाषाई टकराव के रूप में निरंतर बढ़ता जा रहा है।
भाषा अभिव्यक्ति का मात्र एक माध्यम है। उसे जाति, धर्म या किसी अन्य संस्कृति से जोड़ना उचित नहीं है। भाषा का चयन वक्ता नहीं करता, बल्कि श्रोता के आधार पर वक्ता अपनी भाषा निर्धारित करता है। स्पष्ट है कि भाषा का निर्धारण वक्ता के नहीं, बल्कि श्रोता के आधार पर होता है।
हमें भाषा के नाम पर होने वाले किसी भी प्रकार के टकराव या प्रचार से स्वयं को दूर रखना चाहिए। भाषा लोगों को जोड़ने का माध्यम है, तोड़ने का नहीं।
भारत में ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि राष्ट्रीय सरकार अपनी एक भाषा तय कर सके, प्रदेश अपनी भाषा निर्धारित कर सकें, और परिवार या गाँव भी चाहें तो अपनी-अपनी भाषा चुन सकें। प्रत्येक व्यक्ति को किसी भी भाषा में बोलने की स्वतंत्रता होनी चाहिए; किसी को भी किसी विशेष भाषा के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
मेरा मत है कि भाषा हर इकाई की इकाईगत स्वतंत्रता होनी चाहिए।
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