जौनपुर (उत्तर प्रदेश) में हाल ही में एक अत्यंत विचलित करने वाली घटना सामने आई,

जौनपुर (उत्तर प्रदेश) में हाल ही में एक अत्यंत विचलित करने वाली घटना सामने आई, जहाँ एक सामान्य व्यक्ति ने मेडिकल कॉलेज में दाख़िला पाने के उद्देश्य से स्वयं का पैर कटवा लिया। उसे यह विश्वास था कि अपाहिज होने के बाद वह दिव्यांग कोटे के अंतर्गत मेडिकल कॉलेज में प्रवेश पा सकेगा और भविष्य में डॉक्टर बन जाएगा। दुर्भाग्यवश उसकी यह जालसाज़ी उजागर हो गई।
यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि यह घटना न तो किसी एक स्थान तक सीमित है और न ही केवल दिव्यांग कोटे से जुड़ी हुई है। बड़ी संख्या में लोग आदिवासी, दलित अथवा अन्य आरक्षित श्रेणियों के नाम पर भी इसी प्रकार की जालसाज़ी करते रहे हैं और अनेक मामलों में सफल भी हुए हैं।
इस प्रकार की घटनाएँ यह सिद्ध करती हैं कि यदि समाज में किसी व्यक्ति को जाति, धर्म या किसी विशेष पहचान के आधार पर विशेष अधिकार दिए जाते हैं, तो गलत प्रवृत्ति के लोग उसका दुरुपयोग अवश्य करेंगे। वर्तमान की भ्रष्ट और कमजोर व्यवस्था इस दुरुपयोग को प्रभावी ढंग से रोकने में असमर्थ है।
मैं लंबे समय से यह कहता रहा हूँ कि आदिवासी, दलित, महिला और दिव्यांग वर्गों को कुछ विशेष सुविधाएँ दी जा सकती हैं, किंतु इन्हें स्थायी और कठोर “विशेष कोटा” देना धूर्तता और छल की प्रवृत्ति को बढ़ावा देने वाला सिद्ध होता है।
आज देशभर में ऐसे धूर्त लोगों की संख्या बढ़ने का कारण व्यक्ति के स्वभाव में आई गिरावट नहीं है, बल्कि सरकार द्वारा बनाए गए वे कानून हैं जिनका दुरुपयोग आसानी से किया जा सकता है।
इसलिए मेरा अब भी स्पष्ट मत है कि राजनीतिक व्यवस्था को इस प्रकार के भेदभावपूर्ण प्रावधानों को समाप्त करना चाहिए। सभी को योग्यता के आधार पर अवसर और कार्य दिया जाना चाहिए, और जो वास्तव में कमजोर हैं उन्हें सहायक सुविधाएँ दी जा सकती हैं—परंतु कृत्रिम विशेषाधिकार नहीं।