गांधी जी वर्ग समन्वय के पक्षधर थे, जबकि कम्युनिस्ट विचारधारा वर्ग विद्वेष की।

गांधी जी वर्ग समन्वय के पक्षधर थे, जबकि कम्युनिस्ट विचारधारा वर्ग विद्वेष की। दोनों स्थितियों का अंतर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
वर्ग समन्वय का अर्थ है—समाज के मजबूत वर्गों के मन में कमजोर वर्गों के प्रति कर्तव्य-बोध को सुदृढ़ करना।
इसके विपरीत, वर्ग विद्वेष का अर्थ है—कमजोर वर्गों के मन में अन्याय और टकराव की भावना को लगातार मजबूत करना।
वर्ग समन्वय सामाजिक एकता को बढ़ाता है, जबकि वर्ग विद्वेष समाज को वर्ग संघर्ष की दिशा में ले जाता है।
गांधी जी वर्ग समन्वय के समर्थक थे, वहीं नेहरू वर्ग विद्वेष की राजनीति के पक्ष में खड़े दिखाई देते हैं। नेहरू को इस दिशा में अंबेडकर का साथ मिला और इन लोगों ने पूरे समाज में वर्ग विद्वेष को लगातार बढ़ाने का काम किया।
महिलाओं को केवल पीड़ित के रूप में प्रस्तुत किया गया, दलितों और आदिवासियों को निरंतर शोषित बताया गया। हर सामाजिक प्रश्न को वर्ग संघर्ष के चश्मे से देखा गया और इस प्रकार समाज में विभाजन की परिस्थितियाँ निर्मित की गईं। जिस विष का बीज उस समय बोया गया था, उसका परिणाम आज वर्ग संघर्ष के रूप में हमारे सामने है।
इस समस्या का समाधान केवल गांधी के मार्ग में है। हमें वर्ग विद्वेष नहीं, बल्कि वर्ग समन्वय के रास्ते पर चलना चाहिए।
मजबूत वर्गों के मन में यह भावना सुदृढ़ की जानी चाहिए कि महिलाओं, दलितों और आदिवासियों के साथ अतीत में अत्याचार हुए हैं, इसलिए उनके प्रति विशेष संवेदनशीलता और सहानुभूति आवश्यक है।
वहीं दूसरी ओर, महिलाओं, दलितों और आदिवासियों को भी यह समझाने की आवश्यकता है कि अतीत में जो कुछ हुआ, उसे पीछे छोड़ते हुए नए सिरे से सामाजिक संबंधों को परिभाषित किया जाए। कमजोर वर्गों को यह आश्वासन मिलना चाहिए कि अब उनके साथ अन्याय नहीं हो रहा है, और मजबूत वर्गों को यह समझना चाहिए कि किसी भी प्रकार का भेदभाव स्वीकार्य नहीं है।
यही कारण है कि मेरी सोच साम्यवादी विचारधारा से पूर्णतः भिन्न है। मैं वर्ग समन्वय के मार्ग पर चलने में विश्वास करता हूँ, जबकि कम्युनिस्ट विचारधारा वर्ग संघर्ष के रास्ते पर चलती है।