योगेंद्र यादव, रवीश कुमार, पुण्य प्रसून बाजपेई, अपूर्वानंद जैसे अनेक लोग समाज में सोने के सिक्के माने जाते थे।
यह बात सही है कि समय बदलते देर नहीं लगती। अभी अधिक समय बीता भी नहीं था कि योगेंद्र यादव, रवीश कुमार, पुण्य प्रसून बाजपेई, अपूर्वानंद जैसे अनेक लोग समाज में सोने के सिक्के माने जाते थे। वे जो कुछ बोलते थे, उसका समाज पर गहरा प्रभाव पड़ता था। ऐसा प्रतीत होता था कि ये लोग देश के बड़े विचारक, चिंतक और दिशा देने वाले व्यक्तित्व हैं, जो हर बात सोच-समझकर कहते हैं।
इन लोगों को देश-विदेश से सम्मान भी मिलता था। मैं स्वयं भी कभी इनके गुण गाया करता था। लेकिन देखिए, समय कैसे करवट बदलता है कि आज वही लोग कौड़ी के तीन हो गए हैं। कई तो लगभग पूरी तरह गुमनामी में चले गए हैं, और जो बचे हैं—जैसे योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण—वे अब अपना रोना रोते दिखाई देते हैं।
कभी कम्युनिस्टों की गाड़ी में सवार होकर ये लोग दिन-रात हवाई जहाज़ों में उड़ते थे, लेकिन लगभग ग्यारह वर्ष पहले वह गाड़ी अचानक दुर्घटनाग्रस्त हो गई और इन सबकी प्रतिष्ठा धूल में मिल गई। आज इनकी मजबूरी यह है कि ये दिन-रात समाज के सामने अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा के लिए गिड़गिड़ाते फिर रहे हैं।
कोई कहता है कि न्यायपालिका सांप्रदायिक हो गई है, कोई कहता है कि चुनाव आयोग पक्षपाती हो गया है, कोई मीडिया को बेईमान बता रहा है, तो कोई साहित्यकारों को बिकाऊ कह रहा है। कुल मिलाकर ये सभी लोग मिलकर उसी व्यवस्था को गालियाँ दे रहे हैं, जिसकी छाती पर सवार होकर इन्होंने पचास वर्षों तक समाज को भ्रमित किया।
अब साम्यवाद की गाड़ी दुर्घटनाग्रस्त हो चुकी है और उसमें सवार लोगों को सचेत हो जाना चाहिए।
हमेशा याद रखिए—समय बदलते देर नहीं लगती।
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