आरक्षण के समाधान की चर्चा में उलझे हुए हैं। यह सत्य है कि स्वतंत्रता से पहले सामाजिक आरक्षण के कारण श्रमजीवियों का शोषण हुआ और
2 फरवरी : प्रातःकालीन सत्र
हम लंबे समय से आरक्षण के समाधान की चर्चा में उलझे हुए हैं। यह सत्य है कि स्वतंत्रता से पहले सामाजिक आरक्षण के कारण श्रमजीवियों का शोषण हुआ और उसी अन्याय के परिणामस्वरूप दलित-आदिवासी जैसी जातियाँ अस्तित्व में आईं। स्वतंत्रता के बाद इस समस्या का समाधान करने के बजाय कुछ लोगों ने इस बुराई का लाभ उठाने का प्रयास किया। परिणामस्वरूप आज जातिवाद, शोषण और उससे जुड़ी अनेक समस्याएँ और अधिक मजबूत होती चली गई हैं।
मेरी दृष्टि में इस समस्या के तीन संभावित समाधान हैं।
सबसे उत्तम समाधान यह है कि श्रम का मूल्य बढ़ने दिया जाए और आरक्षण को पूरी तरह समाप्त कर दिया जाए। इससे बुद्धि और श्रम के बीच की दूरी घटेगी और आरक्षण की आवश्यकता स्वतः समाप्त हो जाएगी।
लेकिन यदि यह समाधान तत्काल संभव न हो, तो दूसरा विकल्प यह हो सकता है कि आरक्षित जातियों को दायित्वों में किसी भी प्रकार का आरक्षण न दिया जाए। दायित्व केवल योग्यता के आधार पर तय हों, जबकि योग्यता अर्जित करने और जीवन-यापन के लिए उन्हें पर्याप्त सुविधाएँ प्रदान की जा सकती हैं।
यदि यह समाधान भी व्यावहारिक न हो, तो तीसरे विकल्प पर विचार किया जा सकता है—जिस जाति या वर्ग को जितना आरक्षण प्राप्त है, उसका आधा केवल गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों तक सीमित कर दिया जाए और शेष आधा वर्तमान व्यवस्था के अनुसार दिया जाए।
मेरे विचार से आरक्षण रूपी इस सामाजिक कैंसर के उपचार के लिए इन तीन बिंदुओं पर गंभीर विचार-मंथन आवश्यक है—क्या संभव है, क्या नहीं, और किस प्रकार किया जा सकता है।
आज प्रातःकाल हमने आरक्षण पर चर्चा की थी। उसी विषय को आगे बढ़ाते हुए अब मैं आरक्षण की जड़ पर चर्चा करना चाहता हूँ। स्वतंत्रता से बहुत पहले आरक्षण की शुरुआत कब हुई, इसका स्पष्ट ऐतिहासिक विवरण उपलब्ध नहीं है। संभव है कि यह पाँच-सात सौ वर्ष पहले शुरू हुआ हो, या उसके बाद। लेकिन इतना निश्चित है कि आरक्षण की वास्तविक शुरुआत तब हुई जब कर्मणा जाति-व्यवस्था को छोड़कर जन्मना जाति-व्यवस्था को स्वीकार कर लिया गया।
उससे पहले श्रमिक को शूद्र और विद्वान को ब्राह्मण माना जाता था। बाद में श्रमिक का पुत्र शूद्र और ब्राह्मण का पुत्र ब्राह्मण माना जाने लगा। राजा का बेटा ही राजा बनने लगा। यही जन्मना आरक्षण था, जिसके दुष्परिणामस्वरूप समाज में अन्याय और अव्यवस्था फैली। संभव है कि हमारी गुलामी में भी इसका योगदान रहा हो, लेकिन इतना तय है कि इस व्यवस्था ने हमारी सामाजिक संरचना को गहरा नुकसान पहुँचाया।
स्वामी दयानंद, महात्मा गांधी तथा अन्य अनेक महापुरुषों ने इस बुराई का समाधान खोजने का प्रयास किया और उनके प्रयासों से बदलाव भी आने लगे। किंतु स्वतंत्रता के बाद, जब न दयानंद रहे और न गांधी, तब कुछ राजनेताओं ने इस बुराई का राजनीतिक लाभ उठाने की योजना बनाई। इस प्रक्रिया में पंडित नेहरू और डॉ. अंबेडकर अग्रणी भूमिका में रहे। उसी राजनीतिक नीयत का परिणाम आज हम सामाजिक टकराव के रूप में देख रहे हैं।
स्वतंत्रता के बाद भारत के सवर्ण समाज को भी यह एहसास हो चुका था कि जन्मना जाति-व्यवस्था उचित नहीं है। इसी कालखंड में जब पंडित नेहरू ने आरक्षण को दस वर्षों के लिए प्रस्तावित किया और गांधी ने उसका समर्थन किया, तो सवर्ण समाज ने इसे एक अस्थायी और सकारात्मक कदम मानकर स्वीकार कर लिया। उस समय उन्हें यह अनुमान नहीं था कि यह व्यवस्था स्थायी रूप ले लेगी।
धीरे-धीरे जातिगत आरक्षण श्रम-शोषण का एक नया सिद्धांत बन गया। केवल लगभग पाँच प्रतिशत दलित-आदिवासी वर्ग ने इसका वास्तविक लाभ उठाया और अपनी आने वाली पीढ़ियों तक को सुरक्षित कर लिया। इसी दौरान श्रीराम शर्मा, बाबा रामदेव और संघ परिवार ने पुनः स्वामी दयानंद और गांधी के मार्ग पर चलकर इस समस्या के समाधान का प्रयास किया, किंतु वे असफल रहे। कारण यह था कि आरक्षण का लाभ उठा चुके ये पाँच प्रतिशत अवर्ण बुद्धिजीवी इस सुविधा को छोड़ने को तैयार नहीं थे।
परिणामस्वरूप आरक्षण धीरे-धीरे जातीय संघर्ष की दिशा में बढ़ने लगा। यह पाँच प्रतिशत तथाकथित अवर्ण पूरे देश को ब्लैकमेल करने लगे। जिस प्रकार सवर्ण समाज ने नेहरू से स्वयं को ठगा हुआ महसूस किया था, उसी प्रकार आज 95 प्रतिशत अवर्ण समाज भी स्वयं को इस पाँच प्रतिशत वर्ग से ठगा हुआ महसूस करने लगा।
स्पष्ट है कि वर्तमान समय में आरक्षण को पूरी तरह समाप्त करना संभव नहीं है, लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि आरक्षण समाप्त हुए बिना जन्मना जाति-व्यवस्था समाप्त नहीं हो सकती। इसलिए मेरा सुझाव है कि या तो ऐसा कानून बनाया जाए कि जो लोग एक बार आरक्षण का लाभ ले चुके हों, उन्हें सवर्ण की श्रेणी में माना जाए, अथवा जो अवर्ण किसी निश्चित आर्थिक रेखा से ऊपर पहुँच चुके हों, उन्हें सवर्ण मान लिया जाए, और शेष के लिए आरक्षण की व्यवस्था यथावत रखी जाए।
कल दिनभर हमने अवर्ण आरक्षण पर चर्चा की थी। आज हम महिला आरक्षण पर चर्चा करेंगे।
स्वतंत्रता से पूर्व समाज में महिला-पुरुष संबंध स्पष्ट रूप से पुरुषों के पक्ष में झुके हुए थे। पारिवारिक व्यवस्था में अप्रत्यक्ष रूप से पुरुष आरक्षण लागू था। यह परिस्थिति-जन्य था या शोषण, यह अलग विषय है। मुख्य विषय यह है कि महिलाओं को परिवार चलाने में सहभागी नहीं, बल्कि केवल सहयोगी माना जाता था—और यही एक प्रकार का आरक्षण था।
इस व्यवस्था के दुष्परिणाम सामने आए और धीरे-धीरे समाज में पुरुष सशक्त होते चले गए, जबकि महिलाओं की भूमिका सीमित होती गई। इस संदर्भ में भी गांधी और स्वामी दयानंद ने सुधार की दिशा में गंभीर प्रयास किए और उनके सकारात्मक परिणाम भी दिखने लगे।
लेकिन स्वतंत्रता के बाद नेहरू और अंबेडकर ने मिलकर इस बुराई का भी राजनीतिक लाभ उठाने का प्रयास किया। यह सत्य है कि यह व्यवस्था एक सामाजिक बुराई थी, और यह भी सत्य है कि गांधी और स्वामी दयानंद इसे धीरे-धीरे, शांतिपूर्वक समाप्त करना चाहते थे। साथ ही यह भी सच है कि नेहरू और अंबेडकर ने इसे अलग नीयत से उपयोग किया।
नेहरू, गांधी और अंबेडकर—तीनों ब्रिटेन में शिक्षित थे, किंतु गांधी पर भारतीय संस्कृति का प्रभाव था, जबकि नेहरू और अंबेडकर पर पश्चिमी संस्कृति का। इसी अंतर का परिणाम है कि आज महिला और पुरुष एक-दूसरे के सामने वर्गों के रूप में खड़े दिखाई देते हैं।
चर्चा आगे भी जारी रहेगी।
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