आवर्ण शोषण और महिला शोषण : एक तुलनात्मक दृष्टि
आवर्ण शोषण और महिला शोषण : एक तुलनात्मक दृष्टि
आवर्ण शोषण और महिला शोषण के बीच मूलभूत अंतर है। आवर्णों का शोषण पूरे समाज स्तर पर हुआ, जबकि महिलाओं का शोषण मुख्यतः परिवार व्यवस्था के भीतर सीमित रहा। समाज के स्तर पर महिलाओं को प्रायः विशेष सम्मान प्राप्त रहा है। परिवार व्यवस्था में भी महिलाओं का शोषण पूर्ण नहीं, बल्कि आंशिक रूप से हुआ, क्योंकि सामान्यतः महिलाएँ विवाह के पश्चात पुरुष के परिवार में जाती थीं और वहाँ परिवार के मुखिया के अधीन रहना उनकी सामाजिक मजबूरी थी।
परिवार व्यवस्था में भी महिलाओं का शोषण मुख्यतः पत्नी की भूमिका तक सीमित रहा—माँ या बहन के रूप में नहीं। इसलिए महिला शोषण को उसी स्तर पर नहीं रखा जा सकता जिस स्तर पर सामाजिक आवर्ण शोषण को रखा जाता है। यह बात स्वीकार्य है कि महिलाओं को परिवार व्यवस्था में सहभागी के बजाय सहयोगी तक सीमित रखा गया, और अब इस व्यवस्था में परिवर्तन की आवश्यकता है।
इस परिवर्तन की सबसे बड़ी बाधा यह है कि साम्यवादी विचारधाराओं ने नेहरू और अंबेडकर का सहारा लेकर महिला और पुरुष के बीच अविश्वास की एक दीवार खड़ी कर दी है। जब तक यह दीवार नहीं टूटेगी, तब तक नई और संतुलित व्यवस्था बनाना अत्यंत कठिन रहेगा। फिर भी मेरा मानना है कि इस दीवार को तोड़ने की पहल पुरुषों को ही करनी चाहिए, भले ही इसमें कुछ महिलाएँ बाधक क्यों न हों।
मैं यह स्पष्ट रूप से समझता हूँ कि तमाम प्रयासों के बावजूद लगभग दो प्रतिशत महिलाएँ ही साम्यवादी विचारधाराओं, नेहरू परिवार और अंबेडकर के प्रभाव में महिला-पुरुष टकराव को सक्रिय रूप से बढ़ा रही हैं। शेष 98 प्रतिशत महिलाएँ इस भूमिका में नहीं हैं। इसलिए मेरा सुझाव है कि महिला-पुरुष टकराव की इस समस्या का समाधान खोजा जाए। चर्चा आगे भी जारी रहेगी।
हम महिला-पुरुष संबंधों पर गंभीर चर्चा कर रहे हैं। यह विषय आदिवासी और दलित प्रश्नों की तुलना में कई गुना अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह सीधे समाज की मूल इकाई—परिवार व्यवस्था—की नींव को प्रभावित करता है। दलित-आदिवासी संबंध समाज व्यवस्था को प्रभावित करते हैं, परिवार व्यवस्था को नहीं। इसी कारण महिला-पुरुष के बीच टकराव कहीं अधिक घातक सिद्ध हो सकता है।
इस विषय पर मैंने गहराई से विचार किया है और पाया है कि समाज स्तर पर महिलाओं के साथ किसी प्रकार का संगठित या वर्गगत अत्याचार नहीं हुआ है। जिन अत्याचारों की चर्चा की जाती है, वे अधिकांशतः अतिरंजित और असत्य हैं। यह स्वीकार करना आवश्यक है कि समाज व्यवस्था में कुछ त्रुटियाँ अवश्य रही हैं, लेकिन इन्हीं त्रुटियों को अत्यधिक बढ़ा-चढ़ाकर समाज-विरोधी तत्वों ने अपने हित साधे हैं।
मैं पूरी तरह आश्वस्त हूँ कि महिला और पुरुष के बीच महिलाओं पर कभी कोई सामाजिक या वर्गगत अत्याचार नहीं हुआ। जो भी अत्याचार हुए हैं, वे व्यक्तिगत रहे हैं, न कि सामाजिक। परिवारों में भी महिलाओं पर कोई संगठित अत्याचार नहीं हुआ। इसलिए इस पूरे विमर्श में हमें मूल प्रश्न पर लौटना होगा—कि जिन लोगों ने इस प्रकार का प्रचार किया, उनकी नीयत क्या थी। जहाँ-जहाँ वास्तविक त्रुटियाँ हुई हैं, उन्हें सुधारना आवश्यक है, इसमें कोई मतभेद नहीं। चर्चा जारी रहेगी।
अब हम महिला-पुरुष संबंधों पर कुछ विस्तृत सुझाव प्रस्तुत कर रहे हैं।
पहली गलती यह हुई कि महिला और पुरुष को अलग-अलग वर्ग मान लिया गया, जबकि महिला और पुरुष अलग-अलग व्यक्ति हो सकते हैं, वर्ग नहीं।
दूसरी गलती यह हुई कि परिवार व्यवस्था को प्राकृतिक इकाई मान लिया गया, जबकि परिवार को एक संगठनात्मक इकाई के रूप में विकसित किया जाना चाहिए था।
तीसरी गलती यह हुई कि महिला-पुरुष समानता का नारा दिया गया, जबकि वास्तव में नारा प्रत्येक व्यक्ति की समानता का होना चाहिए था।
चौथी और सबसे बड़ी गलती यह हुई कि महिला-पुरुष संबंधों में राजनेताओं को पूर्ण हस्तक्षेप की स्वतंत्रता दे दी गई। परिणामस्वरूप आज तक राजनेता यह भी तय नहीं कर सके कि वे महिला-पुरुष के बीच दूरी घटाने के पक्षधर हैं या बढ़ाने के। उन्होंने दोनों विपरीत दिशाओं में एक साथ कार्य किया।
इन सभी त्रुटियों का लाभ उठाकर समाज में वर्ग-विद्वेष फैलाया गया। अब इस स्थिति से बाहर निकलने के लिए कुछ नई नीतियों पर विचार किया जा सकता है।
जो महिलाएँ महिलाओं पर अत्याचार का निरंतर प्रचार करती हैं, उनका प्रत्यक्ष बहिष्कार किया जाना चाहिए। तथाकथित महिला सशक्तिकरण की अवधारणा पूरी तरह समाज-विरोधी है और इसे किसी भी परिस्थिति में स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। परिवार को एक संगठनात्मक इकाई के रूप में पुनर्गठित किया जाए और परिवार के भीतर महिला-पुरुष का भेद समाप्त कर, सभी की भूमिका संयुक्त रूप से तय की जाए। परिवार के प्रत्येक सदस्य को सहभागी माना जाए, केवल सहयोगी नहीं।
भारतीय संविधान से महिला और पुरुष जैसे वर्गसूचक शब्दों को हटाया जाए। महिला-पुरुष संबंधों में राजनीतिक हस्तक्षेप को पूर्णतः समाप्त किया जाए। संभव है कि ये सुझाव महिला-पुरुष संघर्ष से बचने में सहायक सिद्ध हों।
मैं अन्य सुझावों पर भी आगे चर्चा करने के लिए पूरी तरह तैयार हूँ।
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