रूप से असंयमित हो चुका है—एक अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और दूसरे भारत में विपक्ष के नेता राहुल गांधी।
मेरा यह लंबे समय से मानना रहा है कि जहाँ तक संभव हो, असंतुलित प्रवृत्ति वाले व्यक्ति से दूरी बनाए रखनी चाहिए, और यदि उसके पास अत्यधिक शक्ति भी आ जाए, तब तो उससे और अधिक सावधानी बरतनी चाहिए। वर्तमान समय में मुझे प्रतीत होता है कि विश्व राजनीति में ऐसे दो व्यक्ति उभरकर सामने आए हैं जिनका व्यवहार गंभीर रूप से असंयमित हो चुका है—एक अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और दूसरे भारत में विपक्ष के नेता राहुल गांधी।
दुर्भाग्य यह है कि इन दोनों के हाथ में शक्ति आ चुकी है और उसी शक्ति के आधार पर वे भय और दबाव का वातावरण बना रहे हैं। ट्रंप विश्व के किसी भी शासक के बारे में कुछ भी कह देने से नहीं हिचकते। उनके वक्तव्यों में न तो संयम दिखाई देता है, न औचित्य और न ही कोई सीमा। कब, क्या और किस संदर्भ में बोल दिया जाएगा—इसकी कोई निश्चितता नहीं रहती। कुछ हद तक यही स्थिति राहुल गांधी के व्यवहार में भी देखने को मिल रही है।
विपक्ष के नेता के पद के रूप में उन्हें एक ऐसा राजनीतिक हथियार मिल गया है, जिसके प्रयोग में वे अक्सर असंयमित और उत्तेजक भाषा का उपयोग करते दिखाई देते हैं। हाल ही में उन्होंने एक केंद्रीय मंत्री के साथ जिस प्रकार की भाषा का प्रयोग किया, वह सामान्य राजनीतिक मर्यादाओं से परे प्रतीत होती है।
ऐसे परिदृश्य में मैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रणनीतिक सतर्कता की सराहना करता हूँ। ट्रंप ने कई बार नरेंद्र मोदी से टकराव का प्रयास किया, किंतु नरेंद्र मोदी ने चतुराई और संयम के साथ उन परिस्थितियों से स्वयं को अलग रखा। इसी प्रकार राहुल गांधी की ओर से भी अनेक उकसावे आए, लेकिन नरेंद्र मोदी लगातार टकराव से बचने का प्रयास करते दिखाई देते हैं।
हाल की संसदीय स्थिति में भी नरेंद्र मोदी ने सदन में न जाना ही उचित समझा। इस पर राहुल गांधी ने इसे अपनी राजनीतिक विजय और प्रधानमंत्री के भय के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया। मेरा मानना है कि यदि नरेंद्र मोदी ने टकराव से दूरी बनाए रखी, तो इसे डर नहीं, बल्कि रणनीतिक विवेक के रूप में देखा जाना चाहिए।
वास्तव में, जब किसी असंतुलित व्यवहार वाले व्यक्ति के हाथ में शक्ति या शस्त्र हो, तो बिना पूरी तैयारी उसके सामने जाना बुद्धिमानी नहीं, बल्कि मूर्खता का संकेत होता है। ऐसे में सावधानी, दूरी और समय की प्रतीक्षा ही अधिक उपयुक्त रणनीति होती है।
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