भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था एक कदम और आगे बढ़ते-बढ़ते रुक गई।

पिछले दो दिनों में भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था एक कदम और आगे बढ़ते-बढ़ते रुक गई। लगभग 22 वर्ष पहले भी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सदन में बोलने से रोका गया था। उस समय मैंने खुलकर मनमोहन सिंह का पक्ष लिया था और उस घटना को गलत माना था। किंतु पिछले दो दिनों में जो घटनाक्रम सामने आया, वह उस 22 वर्ष पुरानी घटना की तुलना में कई गुना अधिक खतरनाक सिद्ध हो सकता था—जो किसी कारणवश घटित होने से रुक गया।
ऐसा प्रतीत होता है कि यह पूरा घटनाक्रम बहुत बारीकी से योजनाबद्ध था। योजना के अनुसार इस कार्य के लिए छह महिला सांसदों को विशेष रूप से तैयार किया गया था। जिन नामों की चर्चा सामने आ रही है, उनमें आर. सुधा, ज्योति मनी, वर्षा गायकवाड, गण ब्रायन ठाकुर, काव्य और शोभा बचाओ शामिल हैं। अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि उन्हें किसी प्रकार का विशेष प्रशिक्षण दिया गया था या नहीं, लेकिन यह स्पष्ट दिखाई देता है कि वे सभी पूरी तैयारी के साथ गई थीं। ऐसी भी संभावना जताई जा रही है कि प्रधानमंत्री को प्रतीकात्मक रूप से चूड़ियाँ भेंट करने की योजना हो सकती थी।
किसी तरह यह जानकारी लोकसभा अध्यक्ष तक पहुँच गई और उन्होंने प्रधानमंत्री को सदन में आने से रोक दिया। इसके तुरंत बाद प्रियंका गांधी ने यह स्पष्ट किया कि प्रधानमंत्री को किसी प्रकार की शारीरिक क्षति पहुँचाने की कोई योजना नहीं थी। मैं भी मानता हूँ कि ऐसी कोई सीधी योजना नहीं रही होगी, लेकिन यदि यह घटना उस रूप में घटित हो जाती, तो स्थिति किसी भी क्षण विस्फोटक हो सकती थी। सुरक्षा बलों द्वारा बल प्रयोग की नौबत आ सकती थी, अफरा-तफरी मच सकती थी और नारेबाज़ी या प्रतीकात्मक विरोध का तीव्र रूप सामने आ सकता था।
इसके परिणाम अत्यंत गंभीर हो सकते थे। संभव है कि इस घटना के बाद दलदली लोकतंत्र का एक और निर्णायक अध्याय पूरा हो जाता। यह देखना चिंताजनक है कि लोकतंत्र धीरे-धीरे किस दिशा में आगे बढ़ रहा है।
यदि इस लोकतांत्रिक दलदल को समय रहते दलविहीन लोकतंत्र में परिवर्तित नहीं किया गया, तो भविष्य में इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति होना लगभग तय है। क्योंकि वर्तमान परिस्थितियों में यह स्पष्ट होता जा रहा है कि सत्ता और राजनीति के उच्च स्तर पर बैठे कुछ लोग किसी भी सीमा तक जाने से परहेज नहीं करेंगे।