रामानुजगंज शहर में माँ संस्थान द्वारा संचालित “विचार मंथन शिविर” में सहभागी रहा।

मैं पिछले पाँच दिनों तक(12-02-2026 से 16-02-2026) रामानुजगंज शहर में माँ संस्थान द्वारा संचालित “विचार मंथन शिविर” में सहभागी रहा। इस शिविर में देशभर से लगभग 30 गंभीर चिंतकों ने अपने विचार प्रस्तुत किए तथा स्थानीय स्तर पर हजारों लोगों ने भाग लेकर प्रशिक्षण प्राप्त किया। पाँच दिनों की व्यापक चर्चा के बाद यह निष्कर्ष सामने आया कि विश्व की प्रमुख समस्याओं के मूल समाधानों पर गंभीर और समग्र चिंतन वर्तमान में माँ संस्थान ही कर रहा है; इसके अतिरिक्त ऐसा कोई अन्य संस्थान दिखाई नहीं देता जो विश्व-स्तरीय समस्याओं पर इस प्रकार संगठित रूप से विचार कर रहा हो। इस पाँच दिवसीय कार्यक्रम में यह विषय विशेष रूप से उभरा कि विश्व के लिए एक संविधान होना चाहिए और उसके निर्माण हेतु एक विश्व-स्तरीय संविधान सभा गठित की जानी चाहिए। उस संविधान सभा के माध्यम से विश्व संविधान के प्रारूप पर विचार किया जाए। साथ ही, भारत के वर्तमान संविधान की समीक्षा कर उस पर भी गंभीर चिंतन किया जाए। परिवार और गाँव के स्तर पर भी संविधान निर्माण की आवश्यकता पर चर्चा हुई। सामूहिक विचार-विमर्श के बाद यह निष्कर्ष निकला कि विश्व की प्रत्येक इकाई में लोकतांत्रिक संविधान का अभाव एक बड़ी समस्या है। इसलिए वर्तमान संविधानों की गंभीर कमियों पर विचार किया गया तथा नए संविधान के प्रारूप निर्माण के लिए एक स्वतंत्र इकाई का गठन भी किया गया। ऐसे गंभीर चिंतकों की सूची तैयार करने का दायित्व ज्ञानेंद्र आर्य जी ने स्वीकार किया है। वे अन्य साथियों के सहयोग से इस कार्य को शीघ्र गति प्रदान करेंगे। चर्चा और चिंतन की यह प्रक्रिया निरंतर जारी रहेगी।
आज प्रातःकाल(19-02-2026) हमने इस विषय पर भी विचार किया कि व्यवस्था यदि सुदृढ़ होगी तभी व्यक्ति भी सुदृढ़ होंगे। यह निष्कर्ष निकला कि किसी भी इकाई की सुचारु व्यवस्था के लिए उसका संविधान सुदृढ़ और संतुलित होना आवश्यक है। साथ ही यह भी स्पष्ट हुआ कि जब व्यक्ति श्रेष्ठ होते हैं, तो उनका प्रभाव व्यवस्था पर भी पड़ता है। अतः व्यवस्था और व्यक्ति परस्पर एक-दूसरे पर निर्भर हैं; इनमें से किसी एक को अधिक महत्वपूर्ण कहना संभव नहीं। इसी कारण संविधान-चिंतन के साथ-साथ समाज-सशक्तिकरण पर भी पाँच दिनों तक सतत मंथन किया गया। विचार-विमर्श के दौरान यह निष्कर्ष सामने आया कि परिवार व्यवस्था ही समाज व्यवस्था की नींव है। यदि परिवार व्यवस्था अस्त-व्यस्त या विकृत होगी, तो उसका दुष्प्रभाव संपूर्ण समाज व्यवस्था पर पड़ेगा। अतः परिवार व्यवस्था में आई विकृतियों के कारणों की खोज और उनके समाधान का मार्ग तलाशना आवश्यक है। यदि समाज व्यवस्था कमजोर होगी, तो संविधान, धर्म, राज्य और अर्थव्यवस्था—सभी व्यवस्थाएँ प्रभावित और विकृत होंगी।
इसी उद्देश्य से माँ संस्थान के अंतर्गत “ज्ञान यज्ञ परिवार” नामक एक समूह का गठन किया गया, जिसका संचालन हमारे प्रमुख साथी मोहन गुप्ता जी करेंगे। उनके नेतृत्व में समाज व्यवस्था में आई विकृतियों पर गंभीर चिंतन, मंथन और भविष्य की योजनाओं का निर्माण किया जाएगा। परिवार व्यवस्था में वर्तमान विघटन के कारणों को दूर करने के उपायों पर भी विचार किया जाएगा। परिवार को केवल एक प्राकृतिक इकाई न मानकर एक संगठित और उत्तरदायी इकाई के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया जाएगा। इस विषय पर भी चिंतन होगा कि परिवार का अपना एक संविधान हो और वही संपूर्ण समाज व्यवस्था की रीढ़ बने। इसी निर्णय के साथ हमारे दूसरे दिन का कार्यक्रम संपन्न हुआ।