पिछले पाँच दिनों की सामाजिक चर्चा में सबसे पहले यह बात सामने आई कि प्रत्येक इकाई का अपना एक स्वतंत्र संविधान होना चाहिए।

पिछले पाँच दिनों की सामाजिक चर्चा में सबसे पहले यह बात सामने आई कि प्रत्येक इकाई का अपना एक स्वतंत्र संविधान होना चाहिए। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह रही कि परिवार व्यवस्था को अत्यंत सशक्त बनाया जाना चाहिए। परिवार केवल एक प्राकृतिक इकाई नहीं, बल्कि एक संवैधानिक इकाई भी है, इसलिए उसकी स्वतंत्र व्यवस्था होनी चाहिए। तीसरी बात यह सामने आई कि समाज में सामान्यतः लगभग 90% लोग विचारकों द्वारा संचालित होते हैं, जबकि विचारकों की संख्या लगभग 10% के आसपास ही होती है। इसका अर्थ यह है कि समाज सही दिशा में जा रहा है या गलत दिशा में—इसका दोष 90% लोगों पर नहीं डाला जा सकता, बल्कि यह जिम्मेदारी उन 10% लोगों पर आती है जिन्हें हम विचारक कहते हैं। यदि समाज में हिंसा और स्वार्थ की भावना बढ़ रही है, तो इसका कारण संपूर्ण समाज नहीं, बल्कि वे 10% मार्गदर्शक हैं। वर्तमान समय में जिन्हें हम विचारक कहते हैं, वे प्रायः धर्म व्यवस्था और राज्य व्यवस्था में सक्रिय हैं। इन दोनों व्यवस्थाओं के स्वार्थ और हिंसात्मक प्रवृत्तियों के कारण ही समाज गलत दिशा में जा रहा है। इसलिए एक स्वतंत्र और गंभीर विचारकों की संस्था स्थापित की जानी चाहिए, जो स्वार्थ और हिंसा से दूर रहकर विचार-मंथन करे तथा समाज का उचित मार्गदर्शन कर सके। पाँच दिनों की चर्चा के अंत में यही निष्कर्ष निकला कि स्वतंत्र विचारकों का एक समूह बनना चाहिए, जो वर्तमान में नहीं है। आज जन्म के आधार पर राजनेताओं या विचारकों की जो परंपरा बनी हुई है, उसके स्थान पर योग्यता के आधार पर विचारकों का निर्धारण होना चाहिए। ऐसी व्यवस्था का निर्माण आवश्यक है।