इतिहास, विचारधारा और राजनीतिक टकराव: क्या हम फिर वही भूल दोहरा रहे हैं?

पूरी दुनिया में मूलतः तीन प्रकार के व्यक्ति माने जा सकते हैं—पहले, धूर्त; दूसरे, समझदार; और तीसरे, मूर्ख। इतिहास के लंबे कालखंड में बार-बार यह देखने को मिलता है कि धूर्त लोग सीधे सामने नहीं आते, बल्कि वे मूर्खों का उपयोग करके समझदार लोगों को किनारे करने का प्रयास करते हैं। धूर्त प्रायः अदृश्य रहते हैं, मूर्ख सामने आकर सक्रिय दिखाई देता है, और परिणामस्वरूप समझदार व्यक्ति को नुकसान उठाना पड़ता है। इतिहास अपने को समय-समय पर दोहराता है—यह धारणा भी कम प्रचलित नहीं है।

लगभग सौ वर्ष पूर्व हमने देखा कि नाथूराम गोडसे जैसे व्यक्ति ने, किसी विचारधारात्मक प्रभाव या बहकावे में आकर, महात्मा गांधी की हत्या कर दी। गोडसे स्वयं को देशभक्त मानता था, परंतु उसके कृत्य ने देश और समाज को गहरा आघात पहुँचाया। उस एक घटना का दुष्परिणाम आज तक राष्ट्रीय स्मृति में विद्यमान है। इतिहास का यह अध्याय इस बात का उदाहरण बन गया कि किसी भी प्रकार की वैचारिक अंधता कितनी दूरगामी क्षति पहुँचा सकती है।

वर्तमान भारत की राजनीति को देखते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि इतिहास की कुछ प्रवृत्तियाँ पुनः सामने आ रही हैं। आज के संदर्भ में राहुल गांधी एक सक्रिय राजनीतिक भूमिका में हैं और वे नरेंद्र मोदी तथा मोहन भागवत की नीतियों और विचारों का प्रखर विरोध कर रहे हैं। यह विरोध किस सीमा तक जाएगा, इसका अनुमान लगाना कठिन है, परंतु लेखक की दृष्टि में यह टकराव देश और समाज के लिए हानिकारक सिद्ध हो सकता है।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि राजनीतिक परिदृश्य में अनेक नाम चर्चा में रहते हैं—जैसे सोनिया गांधी, सैम पित्रोदा अथवा अन्य वैचारिक धाराओं से जुड़े नेता—परंतु प्रत्यक्ष रूप से मंच पर राहुल गांधी ही दिखाई देते हैं। कुछ लोगों की यह धारणा भी है कि उनके विचारों के पीछे देशी या विदेशी प्रभाव हो सकते हैं, किंतु इस संबंध में कोई स्पष्ट प्रमाण सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। फिर भी लेखक का मत है कि समाज को ऐसे नेताओं से सावधान रहना चाहिए जिनकी नीयत भले ही संदेह से परे हो, परंतु जिनकी नीतियाँ दूसरों से प्रभावित प्रतीत होती हों।

लेखक का यह भी मत है कि पिछले सौ वर्षों में सबसे समझदार राजनेताओं में महात्मा गांधी का नाम अग्रणी रहा है। गांधी को न केवल भारत में, बल्कि विश्व स्तर पर भी वैचारिक ऊँचाई के लिए जाना जाता है। वर्तमान समय में नरेंद्र मोदी और मोहन भागवत को लेखक उस परंपरा को आगे बढ़ाने का प्रयास करते हुए देखते हैं। उनका जीवन और कार्य अभी पूर्ण नहीं हुए हैं, इसलिए अंतिम निष्कर्ष भविष्य पर निर्भर करेगा, किंतु वर्तमान परिस्थितियों में एक वैचारिक प्रतिस्पर्धा स्पष्ट दिखाई देती है।

इसी प्रकार, लेखक के अनुसार, नाथूराम गोडसे की ऐतिहासिक मूर्खता अब तक अप्रतिम रही है, क्योंकि उसके कृत्य से जो सामाजिक-राष्ट्रीय क्षति हुई, उसकी भरपाई आज तक नहीं हो सकी। लेखक की धारणा है कि यदि कोई भी नेता वैचारिक उग्रता या बाहरी प्रभाव में आकर राष्ट्रहित से भटकता है, तो वह उसी प्रकार की भूल दोहरा सकता है।

लेखक द्वारा पूर्व में लिखे गए लेख पर तीखी प्रतिक्रियाएँ भी आईं। कुछ लोगों ने कटु भाषा का प्रयोग किया, तो कुछ ने गहरी नाराज़गी व्यक्त की। लेखक का कहना है कि उनकी बात न गांधीवादियों को पसंद आई, न संघ के समर्थकों को, न गोडसे-समर्थकों को और न ही कट्टर कांग्रेसी विचारधारा के लोगों को। विभिन्न प्रकार के अंधसमर्थकों ने असहमति जताई, परंतु लेखक के अनुसार ठोस तर्क अपेक्षाकृत कम सामने आए।

अंततः लेखक अपनी बात पर कायम रहते हुए यह मानते हैं कि सच्चाई का सामना अक्सर भावनात्मक प्रतिक्रिया से किया जाता है, जबकि उसे तर्क के आधार पर परखा जाना चाहिए। उनका उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष पर व्यक्तिगत आक्षेप करना नहीं, बल्कि इतिहास और वर्तमान राजनीति के बीच संभावित समानताओं की ओर संकेत करना है, ताकि समाज सतर्क और विवेकपूर्ण बना रहे।