धार्मिक कट्टरवाद : सिद्धांत और वास्तविकता

हम लोगों ने कल रात चर्चा कार्यक्रम के अंतर्गत धार्मिक कट्टरवाद पर खुली चर्चा की। मैंने भी लगभग दस मिनट तक अपने विचार रखे। मेरा मानना है कि हम किसी भी प्रकार के धार्मिक कट्टरवाद के पक्ष में नहीं हैं, क्योंकि धार्मिक कट्टरवाद हमारी भारतीय संस्कृति का अंग नहीं है। हम गुणात्मक धर्म के पक्षधर हैं, संगठनात्मक धर्म के नहीं।
इसलिए यदि मुस्लिम कट्टरवाद को देखकर हिंदू भी कट्टरवादी बनता है, तो हम उसका समर्थन नहीं करते। हालांकि हमारा अनुभव यह कहता है कि मुस्लिम समाज में हिंसक प्रवृत्ति रखने वालों की संख्या लगभग 10% हो सकती है, हिंसा का समर्थन करने वालों की संख्या 80% तक हो सकती है, और हिंसा का विरोध करने वालों की संख्या लगभग 5–10% हो सकती है। दूसरी ओर, हिंदुओं में हिंसक प्रवृत्ति रखने वालों की संख्या लगभग 1% होती है, हिंसा समर्थकों की संख्या लगभग 10% मानी जा सकती है, जिन्हें हम वर्तमान वर्ण-व्यवस्था के संदर्भ में रक्षक मानते हैं। शेष 90% लोग—जिन्हें हम मार्गदर्शक, पालक और सेवक कहते हैं—प्रायः हिंसा के विरोधी होते हैं।
ऐसी परिस्थितियों में यदि कभी हिंसा समर्थक हिंदुओं और हिंसा समर्थक मुसलमानों के बीच टकराव की स्थिति उत्पन्न होती है, तो उस समय हम या तो तटस्थ रहेंगे या हिंदुओं की सहायता कर सकते हैं; किंतु मुसलमानों की सहायता तब तक नहीं करेंगे, जब तक वे खुले रूप से हिंसा का विरोध न करें।
सामान्य स्थिति में हम हिंदू कट्टरवाद के भी पूर्णतः विरुद्ध हैं। यदि मुस्लिम कट्टरवाद के विरोध में हिंदू कट्टरवाद सामने आता है, तो हम हिंदू कट्टरवादियों का विरोध नहीं करेंगे—संभव है कि हम चुप रहें या परिस्थिति के अनुसार समर्थन भी करें। फिर भी वर्तमान में Narendra Modi और Mohan Bhagwat के नेतृत्व में सरकार के रहते हुए हमें हिंदू कट्टरवाद का समर्थन नहीं करना चाहिए, क्योंकि वर्तमान समय में ऐसी कोई अनिवार्य परिस्थिति नहीं है। संवैधानिक और कानूनी तरीकों से मुस्लिम कट्टरवाद को नियंत्रित किया जा रहा है, और सरकार इस दिशा में सफल दिखाई देती है।