राज्य और सामाजिक एकता का संबंध

हम इस विषय पर चर्चा कर रहे हैं कि हमारी राज्य व्यवस्था लोकतांत्रिक ढाँचे के भीतर समाज को नियंत्रित रखने के लिए कौन-कौन से उपाय अपनाती है। कल के प्रातः सत्र में हमने एक पहलू पर विचार किया था; आज हम इस बिंदु पर चर्चा कर रहे हैं कि राज्य प्रायः सामाजिक एकता से आशंकित रहता है।
अक्सर यह देखा जाता है कि राज्य इस बात का प्रयास करता है कि समाज पूर्ण रूप से एकजुट न हो पाए। वह धर्म, जाति, भाषा, प्रांत, स्त्री-पुरुष, युवा-वृद्ध, गरीब-अमीर, किसान-मज़दूर, शहर-गाँव आदि अनेक आधारों पर समाज को विभिन्न समूहों में विभाजित रहने देता है या कभी-कभी विभाजन को बढ़ावा भी देता है। ये समूह आपस में टकराते रहें, एक-दूसरे के विरुद्ध सक्रिय रहें—ऐसी स्थिति में राज्य स्वयं को मध्यस्थ या पंच के रूप में प्रस्तुत करता है। वह एक ओर विवाद सुलझाने का दावा करता है, तो दूसरी ओर परिस्थितियों के अनुसार उन्हें विस्तार भी देता रहता है।
यदि समूहों के बीच संघर्ष कम हो जाए, तो कभी-कभी कमजोर वर्गों को संरक्षण या प्रोत्साहन देकर संतुलन बनाने की आड़ में प्रतिस्पर्धा को जीवित रखा जाता है। यह केवल वर्तमान समय की बात नहीं है; इतिहास में भी विभिन्न शासन व्यवस्थाओं में ऐसी प्रवृत्तियाँ देखी गई हैं। परिणामस्वरूप समाज का बड़ा भाग अनजाने में इसी संरचना के भीतर उलझा रहता है।
वर्तमान समय में भी हम देखते हैं कि धर्म, जाति और अन्य सामाजिक विषयों पर होने वाले अनेक विवादों में राजनीतिक तत्वों की भूमिका प्रमुख होती है। इसलिए समाज सशक्तिकरण की दिशा में यह एक बड़ी बाधा है। इस बाधा को दूर करना कठिन अवश्य है, परंतु समाज की दीर्घकालिक एकता और सुदृढ़ता के लिए इस पर गंभीरता से विचार करना अनिवार्य है।