ईरान–अमेरिका संघर्ष: भारत के श्रमजीवियों के लिए संकट या अवसर?

दुनिया में अनेक देश ऐसे हैं जिन्हें श्रम-अभाव वाले देश माना जाता है। वहाँ आम लोगों का जीवन स्तर ऊँचा है, लोग अधिक शिक्षित हैं, लेकिन वहाँ श्रमिक आसानी से उपलब्ध नहीं होते। भारत ऐसे देशों में शामिल है जो श्रम-बहुल हैं। यहाँ के श्रमिक प्रायः दुनिया के विभिन्न देशों में काम करने के लिए जाते हैं। भारत की आबादी का 50% से अधिक हिस्सा श्रमजीवी माना जाता है।

वर्तमान में ईरान–अमेरिका के बीच चल रहा संघर्ष बुद्धिजीवियों के दृष्टिकोण से एक टकराव के रूप में देखा जा रहा है। इस युद्ध से श्रमजीवियों का प्रत्यक्ष संबंध नहीं माना जा सकता। उनके पास संसाधनों के रूप में तेल है, जबकि हमारे पास अनाज, कपड़ा और श्रम है। ऐसे में यह धारणा बनती है कि वे हमारे संसाधनों का शोषण करते हैं।

इस परिस्थिति में यदि अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध की स्थिति उत्पन्न होती है, तो भारत के श्रमजीवियों के लिए यह एक अवसर के रूप में भी देखा जा सकता है, न कि केवल आपदा के रूप में। स्वाभाविक है कि तेल महँगा होगा और यूरिया का उत्पादन प्रभावित हो सकता है। यह भारत के लिए एक अवसर बन सकता है, क्योंकि हमारे पास यूरिया का एक पारंपरिक विकल्प—गोबर—उपलब्ध है। इसी प्रकार, तेल के विकल्प के रूप में हमारे पास श्रम की प्रचुरता है।

भारत की आधे से अधिक आबादी श्रमजीवी है और ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी पारंपरिक खाद का उपयोग किया जाता है। ऐसे में संभावना है कि गोबर के उपयोग में वृद्धि हो, गोबर गैस का प्रयोग बढ़े, और श्रम का महत्व तथा उसकी माँग दोनों बढ़ें। इसके साथ ही लकड़ी जैसे पारंपरिक संसाधनों का उपयोग और महत्व भी बढ़ सकता है।

इसलिए, यदि पूँजीपतियों के लिए श्रम, यूरिया, तेल और गैस महँगे होते हैं, तो उनकी चिंता स्वाभाविक है। लेकिन भारत की बड़ी श्रमजीवी आबादी के दृष्टिकोण से यह परिस्थिति आंतरिक रूप से एक सकारात्मक परिवर्तन का संकेत भी हो सकती है। इस दृष्टि से, यह स्थिति भारत के आम लोगों के लिए केवल संकट नहीं, बल्कि एक अवसर के रूप में भी देखी जा सकती है।