बढ़ती वैश्विक हिंसा और मानवता के सामने खड़ा संकट
हम लगातार दुनिया में बढ़ते हुए युद्धों को लेकर चिंतित हैं। आम लोगों के भीतर हिंसा और स्वार्थ की प्रवृत्ति भी बढ़ती दिखाई दे रही है, जो एक गंभीर चिंता का विषय है। धर्म भी न तो इन युद्धों को रोक पा रहा है और न ही कोई ठोस समाधान प्रस्तुत कर पा रहा है; बल्कि कई बार ऐसा प्रतीत होता है कि धर्म भी कहीं-न-कहीं संघर्ष को बढ़ावा दे रहा है। ऐसी स्थिति में यह एक बड़ी समस्या बन जाती है कि इसका समाधान कैसे खोजा जाए।
मेरे विचार से, जब तक राष्ट्र अंतिम इकाई के रूप में बने रहेंगे, तब तक उनके बीच टकराव और संघर्ष की संभावना बनी रहेगी। इसलिए बेहतर होगा कि पूरी दुनिया के लिए एक साझा व्यवस्था बनाई जाए और एक वैश्विक संविधान तैयार किया जाए। जब वैश्विक स्तर पर एकीकृत व्यवस्था होगी, तभी युद्धों को रोका जा सकेगा और अन्य अनेक समस्याओं को भी कम किया जा सकेगा।
वर्तमान समय में अलग-अलग राष्ट्रों के अपने-अपने संविधान हैं, और वे बने रहेंगे। लेकिन इसके साथ ही एक वैश्विक संविधान भी होना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना भी कुछ इसी उद्देश्य से की गई थी, किंतु समय के साथ उसकी व्यवस्था कमजोर पड़ती गई और वह अपने आदर्श स्वरूप को पूरी तरह प्राप्त नहीं कर सका।
इसलिए मेरे विचार से अब एक ऐसे वैश्विक संविधान की आवश्यकता है, जिसमें पूरी दुनिया के लोग भागीदारी करें। लगभग 700 करोड़ लोगों के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष मत के आधार पर एक संविधान का प्रारूप तैयार किया जा सकता है। इसके लिए प्रारंभिक चरण में दुनिया भर से लगभग 750 प्रतिनिधियों का चयन किया जाए—प्रत्येक एक करोड़ जनसंख्या पर एक प्रतिनिधि के आधार पर। इन 750 व्यक्तियों को संविधान का प्रारूप तैयार करने की जिम्मेदारी दी जाए।
इसके बाद उस प्रारूप पर व्यापक सामाजिक और बौद्धिक स्तर पर गंभीर विचार-विमर्श हो। अंततः वैश्विक मतदान के माध्यम से उस संविधान को स्वीकार कर लागू किया जाए। इस प्रकार एक साझा वैश्विक व्यवस्था स्थापित की जा सकती है, जो मानवता के लिए अधिक शांति और संतुलन का मार्ग प्रशस्त कर सकती है।
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