व्यवस्था और चरित्र का संबंध: लोकतंत्र में सुधार की सही दिशा
लोकतंत्र में व्यवस्था से ही चरित्र बनता है, चरित्र से व्यवस्था नहीं बनती। दुर्भाग्यवश हम अक्सर यह कल्पना करने लगते हैं कि पहले चरित्र बनेगा और उससे व्यवस्था सुधरेगी, जबकि यह दृष्टिकोण कहीं-न-कहीं तानाशाही प्रवृत्ति की ओर संकेत करता है।
इसलिए अब यह विचार करने का समय आ गया है कि वर्तमान समाज में जो चरित्र-पतन दिखाई दे रहा है, उसका मूल कारण व्यवस्था में आए दोष हैं, न कि केवल व्यक्ति का नैतिक पतन। वास्तव में पहले व्यवस्था का चरित्र गिरता है, और फिर उसका प्रभाव व्यक्तियों पर पड़ता है।
इसी संदर्भ में मैं अपने हिंदू समाज के धर्मगुरुओं से निवेदन करना चाहता हूँ कि वे केवल चरित्र-निर्माण पर ही नहीं, बल्कि व्यवस्था-परिवर्तन पर भी गंभीरता से ध्यान दें। जब तक व्यवस्था में सार्थक बदलाव नहीं होगा, तब तक व्यापक स्तर पर चरित्र-सुधार संभव नहीं हो सकेगा। इस सिद्धांत को स्वीकार करना आवश्यक है।
यदि किसी के पास व्यवस्था-परिवर्तन में सक्रिय भूमिका निभाने की क्षमता और योग्यता है, तो उसे प्राथमिकता उसी दिशा में प्रयास करने पर देनी चाहिए। और यदि ऐसी भूमिका निभाना संभव न हो, तब वह चरित्र-निर्माण के कार्य में योगदान दे सकता है।
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