ईरान–इज़रायल संघर्ष: समर्थन के पीछे की मानसिकता और सवाल
ईरान–इज़रायल युद्ध में हम देख रहे हैं कि भारत में भी कुछ लोग ऐसे हैं जो ईरान के साथ खड़े हैं। वे जानते हैं कि ईरान कभी मानवाधिकारों की चिंता नहीं करता, ईरान महिलाओं को समान अधिकार नहीं देता, ईरान बेगुनाह लोगों पर हजारों गोलियां चलवा सकता है, और ईरान दूसरे देशों में अपने गुप्तचर भेजकर उन्हें अस्थिर कर सकता है। इन सब के बाद भी भारत के कई लोग किसी स्वार्थवश या धर्मांध होकर ईरान का समर्थन करते हैं।
अभी आपने देखा होगा कि ईरान ने यह घोषणा की थी कि इज़रायल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू मारे गए हैं, लेकिन घोषणा के कुछ समय बाद ही नेतन्याहू जीवित दिखाई दिए और उन्होंने अपनी जीवित होने का प्रमाण दे दिया। दूसरी ओर, इज़रायल ने घोषणा की थी कि ईरान के सुलेमानी मारे गए हैं। ईरान ने इस घोषणा के बाद भी उनके जीवित रहने का दावा किया और दावा ही नहीं किया, बल्कि उनके हाथ से लिखा हुआ एक पत्र भी प्रकाशित कर दिया। आश्चर्य है कि ईरान ने दूसरे दिन उसी व्यक्ति को मृत घोषित कर दिया। यदि वह जीवित था तो पत्र नहीं लिख सकता था, और यदि पत्र लिखा था तो वह जीवित था।
अब आप विचार करिए कि जो लोग ईरान के पक्षधर हैं, वे किस प्रकार की सोच रखते हैं।
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