लोकतंत्र बनाम तानाशाही: विचारधारात्मक टकराव

अमेरिका–इज़रायल युद्ध ने समाज और राज्य की अलग-अलग भूमिकाएँ साफ कर दी हैं। हम समाज के लोग सरकार की मजबूरियाँ भी समझते हैं, इसलिए हम सरकार की नीतियों का विरोध नहीं करते, लेकिन हम सामाजिक परिस्थितियों को देखते हुए अपने विचार भी व्यक्त करते रहते हैं। हम आँख बंद करके सरकार का समर्थन करने के लिए बाध्य नहीं हैं।

ईरान–इज़रायल के संघर्ष में भारत की आम जनता ने इज़रायल का साथ दिया। कुछ शिया मुसलमान, कम्युनिस्ट और विपक्ष के नेताओं को छोड़कर आम हिंदू इज़रायल–अमेरिका के पक्ष में रहा। आम मुसलमान तटस्थ रहा, सिर्फ कश्मीर में हंगामा हुआ, वह भी सिर्फ विधानसभा में। अन्य देशभर में ईरान के समर्थन में कोई आवाज नहीं उठी। कम्युनिस्टों की आवाज तो वैसे ही समाज के विरुद्ध मानी जाती है।

कल मेरे कुछ मित्रों ने अमेरिका के विरोध प्रदर्शन की चर्चा की। हम इस प्रकार के विरोध प्रदर्शन को बुरा नहीं मानते। अमेरिका की प्रशंसा की जानी चाहिए कि वहाँ ऐसा विरोध प्रदर्शन भी संभव हुआ, जबकि ईरान में यदि हुआ तो हजारों लोगों को गोलियाँ मार दी गईं, और अब तो वर्तमान समय में गोली मारने का खुला आदेश दिया हुआ है। फिर भी हमारे गुलाम कम्युनिस्ट अमेरिका की आलोचना करते हैं और ईरान का समर्थन करते हैं, क्योंकि वे स्वयं तानाशाह हैं और ईरान की तानाशाही के समर्थक भी हैं।

मैं आपको स्पष्ट करना चाहता हूँ कि हम किसी भी परिस्थिति में लोकतंत्र की तुलना में तानाशाही का समर्थन नहीं करेंगे, और हम लोग स्वराज की तुलना में लोकतंत्र का समर्थन करेंगे। भारत से अब कम्युनिस्ट लगभग समाप्त हो रहे हैं और धीरे-धीरे यह मार्ग दुनिया तक बढ़ेगा।