समान नागरिक संहिता: सामाजिक विभाजन का स्थायी समाधान
8 अप्रैल प्रातःकालीन सत्र: समान नागरिक संहिता पर चर्चा।
मैंने दो दिनों में सांप्रदायिकता और लिंग भेद जैसी बड़ी-बड़ी समस्याओं के समाधान में समान नागरिक संहिता की भूमिका पर चर्चा की थी। इसी तरह की एक बहुत बड़ी समस्या सवर्ण और अवर्ण के बीच भी है। मैं मानता हूँ कि प्राचीन समय में कुछ गलतियाँ हुई हैं। उन गलतियों का समाधान स्वामी दयानंद, गांधी, श्री राम शर्मा आदि महापुरुष निरंतर कर रहे थे, लेकिन अंबेडकर और नेहरू—ये दोनों इस समस्या से लाभ उठाना चाहते थे। परिणाम यह हुआ कि सवर्ण और अवर्णों के बीच आरक्षण की एक गहरी दीवार खड़ी कर दी गई।
यह आरक्षण तत्काल समाप्त होना चाहिए, लेकिन वर्तमान समय में इस आरक्षण को खत्म करना संभव नहीं है, क्योंकि दो-तीन प्रतिशत अंबेडकरवादी इस आरक्षण के माध्यम से इतने सशक्त हो गए हैं कि वे पूरे समाज को विभाजित करने का प्रयास करते हैं। इसलिए आरक्षण का समाधान भी हो जाए और समाज में कोई टकराव भी न हो, इसका सबसे अच्छा मार्ग समान नागरिक संहिता है।
यदि समान नागरिक संहिता लागू हो जाए तो दलित, आदिवासी, सवर्ण, उच्च-नीच—सारी बातें पूरी तरह समाप्त हो जाएँगी। इसलिए मैं इस विचार का हूँ कि हमें आरक्षण का विरोध न करके समान नागरिक संहिता का समर्थन करना चाहिए।
मैं इस बात से सहमत हूँ कि स्वतंत्रता के पहले की व्यवस्था ठीक नहीं थी और उसका समर्थन नहीं किया जा सकता, लेकिन स्वतंत्रता के बाद लागू किया गया आरक्षण भी उचित नहीं है। इसलिए हम समान नागरिक संहिता की मांग कर रहे हैं।
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