समान नागरिक संहिता: सामाजिक समानता और न्याय की दिशा में कदम

9 अप्रैल प्रातःकालीन सत्र: समान नागरिक संहिता की आवश्यकता पर चर्चा।

दुनिया में सबसे अधिक खतरनाक जाति कम्युनिस्टों की मानी जाती है। ये सिर्फ वर्ग-विद्वेष फैलाते हैं और इनका कोई अन्य कार्य नहीं है। वर्ग-विद्वेष फैलाने में भी ये सबसे अधिक गरीब और अमीर के बीच टकराव पैदा करते हैं और बीच में कमीशन खाते हैं।

सच बात यह है कि प्राकृतिक रूप से दुनिया के कोई भी दो व्यक्ति एक समान योग्यता, क्षमता और प्रवृत्ति के नहीं होते। स्पष्ट है कि प्रत्येक व्यक्ति में यह अंतर असीम होता है और इसीलिए गरीबी और अमीरी की कोई सीमा नहीं बनाई जा सकती, क्योंकि योग्यता, क्षमता और प्रवृत्ति की कोई सीमा नहीं है।

गरीबों की मदद करना अमीरों का कर्तव्य है, गरीबों का अधिकार नहीं; लेकिन हमारी पिछली सरकारों ने इसे गरीबों का अधिकार घोषित कर दिया और दुर्भाग्य से संविधान में भी कई इस प्रकार की बातें शामिल कर दी गई हैं, जो गलत हैं।

स्पष्ट है कि सरकार का काम गरीबी दूर करना नहीं है, सरकार का काम अमीरी रोकना नहीं है। सरकार का काम यह है कि कोई भी व्यक्ति किसी अन्य की स्वतंत्र प्रतियोगिता में बाधा उत्पन्न न कर सके। सरकार चाहे तो सिर्फ इतना कर सकती है कि कोई व्यक्ति भूख से न मरे—इसकी गारंटी दे सकती है। इसके अतिरिक्त सरकार का कोई कार्य नहीं है कि वह गरीबों की मदद करे या अमीरों की अमीरी रोके।

यह कार्य समाज का है। समाज इस कार्य को कर सकता है और समाज को करना भी चाहिए। इसलिए जब समान नागरिक संहिता होगी, अमीर और गरीब के बीच कोई अलग से कानून नहीं होगा, प्रत्येक व्यक्ति बराबर होगा, तब गरीब और अमीर के नाम पर झगड़े समाप्त हो जाएंगे।

तब साम्यवादियों तथा अन्य राजनेताओं की दुकानदारी समाप्त हो जाएगी। तब गरीब लोग सरकार से कोई मांग नहीं करेंगे, बल्कि वे अपनी क्षमता में सुधार करेंगे।

गरीब और अमीर शब्द को शब्दकोष से निकाल दिया जाना चाहिए, क्योंकि दुनिया का प्रत्येक व्यक्ति दूसरों की अपेक्षा गरीब होता है और अन्य लोगों की अपेक्षा वही व्यक्ति अमीर भी होता है। गरीबी और अमीरी सापेक्ष होती है, निरपेक्ष नहीं।