महिला आरक्षण पर टकराव: राजनीति, समाज और प्रतिनिधित्व की बहस
हम हमेशा ही किसी भी प्रकार के आरक्षण के खिलाफ रहे हैं क्योंकि आरक्षण पूरी तरह कमजोरों के विरुद्ध बुद्धिजीवियों का षड्यंत्र है। हम हमेशा महिला आरक्षण के भी खिलाफ रहे हैं। यह आरक्षण राजनीतिक दलों का समाज को कमजोर करने की योजना का भाग होता है। कल संसद में महिला आरक्षण 5 वर्षों के लिए और टल गया। यद्यपि महिला आरक्षण का खतरा खत्म नहीं हुआ है जो आरक्षण 2 वर्ष बाद होना था वह अब 7 वर्ष के बाद होगा सिर्फ इतना ही फर्क पड़ा है लेकिन आरक्षण तो होगा ही। कल जिस संविधान संशोधन विधेयक पर चर्चा हो रही थी वह राजनीतिक दलों का आपसी कंपटीशन का मामला है कि कौन महिलाओं की सहानुभूति अधिक तेज आधार पर प्राप्त कर सकता है। निश्चित रूप से इस सहानुभूति के मामले में भारतीय जनता पार्टी को कुछ लाभ हुआ है क्योंकि भारतीय जनता पार्टी जल्दी से महिला आरक्षण लागू करके महिलाओं का लाभ लेना चाहती थी उसे विपक्ष ने रोक दिया स्वाभाविक है की भाजपा इसका लाभ उठाना चाहेगी। लेकिन समाज को इस विधेयक के ना गिरने से कोई लाभ है ना पास होने से कोई लाभ है क्योंकि महिला आरक्षण विधेयक के नाम से समाज को महिला और पुरुष में बांटने की सिर्फ एक गलत कोशिश मात्र है और कुछ नहीं। अच्छा हुआ विधेयक गिर गया कम से कम 5 साल तो अब यह झंझट नहीं रहेगी। हम नई व्यवस्था का योग प्रारूप बना रहे हैं उसे व्यवस्था में आरक्षण का लाभ सिर्फ शरीफ लोगों को मिलेगा अन्य किसी को भी नहीं जो व्यक्ति सब प्रकार के सामाजिक और संवैधानिक कानून का पालन करेगा उसे आरक्षण का लाभ दिया जाएगा
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