नरेंद्र मोदी सरकार से बढ़ती अपेक्षाएँ और समर्थकों की निराशा
आज मैंने प्रसिद्ध मोदी समर्थक रामेश्वर मिश्र जी के विचार पढ़े। वह काफी निराश थे। उन्होंने लंबे समय तक नरेंद्र मोदी और संघ का समर्थन किया। उन्होंने बहुत आगे बढ़कर कांग्रेस पार्टी और इस्लाम का विरोध किया था। उन्होंने हमेशा गांधी विचारधारा का भी विरोध किया।
उन्हें यह उम्मीद थी कि जब नई सरकार बनेगी तो वह सरकार मुसलमानों के साथ वैसा ही व्यवहार करेगी जैसा पिछले समय में हिंदुओं के साथ हुआ था। उन्हें उम्मीद थी कि नई सरकार आने के बाद ब्राह्मणों को बहुत अधिक शक्ति मिलेगी और सरकार वैसी ही चलेगी जैसा ब्राह्मण चाहेंगे, क्योंकि सरकार बनाने में ब्राह्मणों की बहुत भूमिका रही है।
उन्हें इस बात की भी उम्मीद थी कि नरेंद्र मोदी उन लोगों का भी ख्याल रखेंगे जिन्होंने लड़ाई लड़कर मुस्लिम सांप्रदायिकता और नेहरू परिवार को हटाने में एकतरफा समर्थन दिया।
आज जब रामेश्वर मिश्र जी यह देखते हैं कि वर्तमान सरकार धर्मनिरपेक्षता और मानवता की राह पर चल रही है, हिंदू राष्ट्र की जगह समान नागरिक संहिता की बात कर रही है, किसी के साथ पक्षपात नहीं कर रही है और ब्राह्मणों को भी अन्य लोगों के समान ही माना जा रहा है, तो उनका क्रोध उबल रहा है।
रामेश्वर मिश्र जी ऐसे अकेले व्यक्ति नहीं हैं। देश भर में बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जो नरेंद्र मोदी सरकार की लोकतांत्रिक, गांधीवादी, निष्पक्ष और धर्मनिरपेक्ष शासन व्यवस्था से दुखी हैं। उनके सामने कोई तीसरा मार्ग भी नहीं है, क्योंकि वे न तो मुसलमानों के साथ जा सकते हैं और न ही नेहरू परिवार के साथ।
लेकिन यह भी सच्चाई है कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है, तानाशाही नहीं। हिंदू भी मुसलमानों की नकल नहीं कर सकता। हम लोग वर्तमान नरेंद्र मोदी, मोहन भागवत और योगी आदित्यनाथ की मिली-जुली सरकार से पूरी तरह संतुष्ट हैं।
रामेश्वर मिश्र जी को हिंदुत्व का अनुकरण करना चाहिए, इस्लाम का नहीं।
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