परिसीमन, महिला आरक्षण और तमिलनाडु की राजनीति पर विचार
यह बात जग जाहिर है कि तमिलनाडु हमेशा उत्तर भारत को ब्लैकमेल करता रहता है। और जब जरूरत पड़ती है तब तमिलनाडु किसी न किसी नाम पर कुछ दक्षिण भारत के राज्यों को अपने साथ जोड़ लेता है। परिसीमन हर 10 वर्ष में होना चाहिए था संवैधानिक आधार पर और व्यवस्था के आधार पर भी परिसीमन होना ही चाहिए। लेकिन 1973 के बाद जब भी परिसीमन की बात उठी तो उस परिसीमन को तमिलनाडु ने ब्लैकमेल किया। कोई ना कोई बाधा पहुंचाई । मामला परिसीमंन का ही नहीं है भाषा के मामले में भी तमिलनाडु पूरे देश को ब्लैकमेल करता है धर्म के नाम पर भी ब्लैकमेल करता है यहां तक की शिक्षा नीति के नाम पर भी वह हमेशा अरंगेबाजी करता रहता है। ऐसा ही उसने इस बार भी परिसीमन के नाम पर किया। सच्चाई है कि पूरा उत्तर भारत परिसीमन के पक्ष में है दक्षिण भारत के भी लोग उसके विरुद्ध ना के बराबर हैं लेकिन तमिलनाडु की दादागिरी से कोई उलझना नहीं चाहता और वर्तमान में जो परिसीमन का बिल रोका गया वह वास्तव में महिला आरक्षण के कारण रोका गया ना कि परिसीमन के कारण क्योंकि परिसीमन तो होना ही है 5 वर्ष बाद और 5 वर्ष पहले लेकिन किसी न किसी तरह महिला आरक्षण को उत्तर भारत का पूरा विपक्ष और कांग्रेस पार्टी रोकना चाहती थी और उसने परिसीमन का एक बहाना बना लिया । मेरे विचार से परिसीमन जितना जल्दी हो उतना अच्छा है क्योंकि आबादी के अनुसार ही लोकसभा सिट बननी चाहिए। यदि महिला आरक्षण बिल को रोक कर भी रखना है तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है लेकिन परिसीमन कानून को तत्काल लागू करिए। तमिल नाडु की दादागिरी का पूरे देश को जवाब देना चाहिए
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