संघ: समुद्र के समान निस्वार्थ और व्यापक संगठन
संघ की तुलना एक ऐसे समुद्र से की जाती है, जो सभी जीवों को अंतिम शांति देता है। सभी अंत में उसी में समाहित होते हैं। लेकिन समुद्र का पानी हमेशा खारा होता है, वह किसी जीव के उपयोग में नहीं आता। इसी तरह संघ का भी चरित्र है।
संघ में जो भी शामिल होता है, वह संघ से कुछ प्राप्त करने की इच्छा नहीं रखता, संघ को देता ही है। और यदि कोई संघ से कुछ प्राप्त करना चाहता है, तो वह निराश ही होता है, क्योंकि संघ एक समुद्र है। संघ अपना जल भाप बनकर सब जीवों को आवश्यकता अनुसार पहुँचाता है, लेकिन संघ किसी दाता को किसी तरह का लाभ नहीं देता।
यही कारण है कि संघ को अब तक ब्राह्मणों की पार्टी माना जाता था। ऐसा माना जाता था कि संघ पर ब्राह्मणों का वर्चस्व है, लेकिन जब कुछ ब्राह्मण, जो संघ से कुछ प्राप्त करना चाहते थे, उन्हें उस समय झटका लगा, जब संघ ने उन संगठित ब्राह्मणों को कोई विशेष रियायत देने से इनकार कर दिया, क्योंकि संघ सर्वजाति, सर्वधर्म, सर्व मानव समूह का एक संगठन है, किसी जाति के लिए नहीं।
आज यह बात सिद्ध हो गई है कि संघ अपने मूल स्वभाव के अनुसार समुद्र के समान है और उसकी परीक्षा लेने वाले ब्राह्मण संगठन फेल हो गए हैं। मैं संघ की इस परीक्षा में पास होने पर संघ को नमन करता हूँ। संघ को एक समुद्र के समान ही भारी रहना चाहिए, क्योंकि सर्वजाति, सर्वधर्म, सर्व मानव समूह को संघ से बहुत उम्मीदें हैं।
कुछ तथाकथित स्वार्थी ब्राह्मण अब कुछ मंत्रियों के साथ, मुसलमानों के साथ, देशद्रोहियों के साथ तालमेल कर रहे हैं। इससे हम भले ही बंगाल चुनाव हार जाएँ, इससे भले ही देश की सरकार चली जाए, लेकिन हमारा स्वभाव नहीं बदलना चाहिए। संघ सरकार के लिए नहीं, समाज के लिए है। समुद्र को कभी धमकियों से विचलित नहीं होना चाहिए।
हमें पूरे समाज की योग्यता पर भरोसा करना चाहिए। कुछ मुट्ठी भर स्वार्थी लोग हमें अपने उचित मार्ग से विचलित नहीं कर सकते।
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