राजनीतिक उथल-पुथल के दौर में नई संभावनाएँ
सारी दुनिया की राजनीति आज चौराहे पर खड़ी दिखाई दे रही है। एक नई उथल-पुथल चल रही है और नए राजनीतिक समीकरण बनते दिखाई दे रहे हैं। इसी प्रकार भारतीय राजनीति भी एक निर्णायक मोड़ पर पहुँच गई है। वर्तमान में पाँच राज्यों के चुनाव निर्णायक दौर में हैं और पूरे भारत में संघ परिवार तथा भारतीय जनता पार्टी को व्यापक समर्थन मिलने की चर्चा हो रही है। वहीं साम्यवाद और राजनीतिक इस्लाम के प्रभाव में कमी आने की बात भी कही जा रही है। विपक्ष नए राजनीतिक समीकरण तलाशने में लगा हुआ है।
ऐसा प्रतीत होता है कि राजनीति में अब कुछ नए गठबंधन उभर सकते हैं। कुछ लोगों का मानना है कि अतिवादी हिंदू, अतिवादी मुसलमान और अतिवादी कम्युनिस्ट मिलकर एक नया मोर्चा बनाने की दिशा में बढ़ रहे हैं। वर्तमान भारत सरकार को समन्वयवादी बताया जा रहा है, जबकि अतिवादी विचारधाराएँ इस समन्वय को स्वीकार नहीं करना चाहतीं।
विपक्ष के नेताओं के बीच भी अलग-अलग सोच दिखाई देती है। Rahul Gandhi, Akhilesh Yadav, Uddhav Thackeray और Sharad Pawar को अपेक्षाकृत शांतिप्रिय माना जाता है, जबकि Arvind Kejriwal के बारे में आलोचक तानाशाही प्रवृत्ति का आरोप लगाते रहे हैं। इसी प्रकार Mamata Banerjee और Tejashwi Yadav पर भी राजनीतिक आक्रामकता और दादागिरी की राजनीति के आरोप लगाए जाते रहे हैं।
आज ममता बनर्जी द्वारा त्यागपत्र न देने की घटना को कुछ लोग लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति अविश्वास के रूप में देख रहे हैं। यह धारणा लंबे समय से कुछ वर्गों में मौजूद रही है। अब प्रश्न यह है कि विपक्ष अतिवादी हिंदुत्व की राजनीति के साथ किस दिशा में जाना चाहता है।
सत्ता पक्ष को भी अधिक सावधान रहने की आवश्यकता होगी। यदि अतिवादी हिंदू, मुसलमान और कम्युनिस्ट मिलकर कोई नया राजनीतिक गठबंधन बनाते हैं, तो संतुलनवादी और समन्वयवादी विचारधारा वाले लोग भी उसके मुकाबले के लिए तैयार रहेंगे।
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