बंगाल में नई राजनीतिक व्यवस्था की उम्मीद

पश्चिम बंगाल में पिछले 15 वर्षों के शासन को लेकर यह आरोप लगाए जाते रहे हैं कि विदेशी मुसलमानों को बुलाकर उनकी जनसंख्या बढ़ाने का प्रयास किया गया। दूसरी ओर, ममता बनर्जी के समर्थकों और स्थानीय गुंडों पर आम नागरिकों की संपत्ति और मकानों पर मनमाने कब्जे करने के भी आरोप लगे। कुछ लोग इसकी तुलना बिहार के पुराने राजनीतिक दौर से करते हैं और मानते हैं कि बंगाल में स्थिति उससे भी अधिक भयावह हो गई थी।

चुनाव के दौरान वहाँ के आम नागरिक खुलकर अपनी राजनीतिक राय बताने से डरते थे। यदि कोई पत्रकार उनसे पूछता था, तो भय के कारण वे ममता बनर्जी के पक्ष में ही बोलते दिखाई देते थे। चुनाव परिणाम घोषित होने से पहले तक बड़ी संख्या में लोग यह बताने के लिए तैयार नहीं थे कि उन्होंने किसे वोट दिया है। लोकतांत्रिक देश भारत में इस प्रकार का भय और गुंडागर्दी असामान्य माना जा रहा था।

इसके बावजूद बंगाल की जनता ने साहस दिखाया और भारत सरकार तथा लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर विश्वास जताते हुए परिवर्तन का समर्थन किया। कुछ लोग इसे उसी प्रकार की मुक्ति मानते हैं जैसी कभी लंबे समय तक चले कम्युनिस्ट शासन से बंगाल को मिली थी। उनके अनुसार कम्युनिस्ट शासन समाप्त होने के बाद भी जनता को वैसी ही राजनीति का सामना करना पड़ा।

अब यह कहा जा रहा है कि बंगाल की जनता पहली बार स्वयं को अधिक स्वतंत्र महसूस कर सकती है। समर्थकों का मानना है कि बंगाल गुंडागर्दी और सांप्रदायिक राजनीति से मुक्त होने की दिशा में बढ़ रहा है। कुछ लोगों ने यह भी कहा कि जनता ने देख लिया कि सत्ता के अहंकार का अंत किस प्रकार होता है।

मैं बंगाल के नए मुख्यमंत्री से निवेदन करूँगा कि वे Yogi Adityanath को कुछ समय के लिए सलाहकार के रूप में मानकर कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक सुधारों पर विशेष ध्यान दें।