हिंदू-मुस्लिम पारिवारिक संरचना की तुलना और नई परिवार व्यवस्था की खोज

 

मैंने आज लिखा था कि हिंदुओं की तुलना में मुसलमानों में आत्महत्याएँ कम होती हैं। यदि भारत में आत्महत्याओं के प्रतिशत का आकलन करें, तो मुस्लिम महिलाओं में यह प्रतिशत बहुत कम है। मुसलमान परिवारों में पारिवारिक झगड़ों के कारण आपसी हत्याओं या अन्य अपराधों का प्रतिशत भी कम है, जबकि यह प्रतिशत हिंदुओं में बहुत अधिक दिखाई देता है।

हालाँकि मुसलमानों में हिंदुओं की अपेक्षा महिलाओं को कम स्वतंत्रता है। मुसलमानों में बुर्का प्रथा है, पुरुष चार विवाह कर सकते हैं, जबकि हिंदुओं में महिलाओं को अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्रता प्राप्त है। इसके बाद भी इस प्रकार की घटनाएँ कहीं-न-कहीं सोचने को विवश करती हैं कि यह अंतर क्यों है।

मैंने भी इस पर विचार किया है। इस प्रकार के टकराव प्रायः उम्मीदों के पूरा न होने पर सामने आते हैं। मुस्लिम महिलाएँ और पुरुष अपना भविष्य पहले से समझ लेते हैं। उनकी उम्मीदें हिंदुओं के समान नहीं होतीं। यही कारण है कि उनमें पारिवारिक टकराव कम होता है, जबकि हिंदुओं में स्वतंत्रता की उम्मीदें बहुत अधिक होती हैं और जब किसी कारण से वे उम्मीदें टूटती हैं, तब इस प्रकार की पारिवारिक घटनाएँ होती हैं।

हमें इस बात पर गंभीरता से विचार करना चाहिए कि मुसलमानों की प्रणाली सही है, हिंदुओं की प्रणाली सही है, अथवा कोई तीसरा तरीका निकाला जाए। हम उस तीसरे तरीके पर लगातार चिंतन-मंथन कर रहे हैं।

मैंने इस विषय पर आगे विचार किया। मुसलमानों ने धर्म को एक संगठन का रूप दिया है और संगठन में अलगाव हो सकता है, लेकिन टकराव कम होता है, आत्महत्याएँ कम होती हैं। हिंदू धर्म संगठन नहीं है, और मैं उसे संगठन बनाना भी नहीं चाहता। मैं हिंदू धर्म को इस्लाम की तुलना में बेहतर समझता हूँ, लेकिन परिवार व्यवस्था के मामले में मैं एक बदलाव चाहता हूँ।

मेरा विचार है कि परिवार को केवल एक प्राकृतिक इकाई न मानकर उसे एक संगठन का रूप दिया जाए। इससे परिवारों के आपसी झगड़े बहुत कम हो सकते हैं और परिवारों में आत्महत्याएँ भी रुक सकती हैं। यदि परिवारों में आपसी झगड़े समाप्त हो जाएँ, तो न्यायालयों का बोझ भी बहुत कम हो सकता है।

इसलिए मेरा सुझाव है कि हम वर्तमान परिवार प्रणाली की जगह संगठित परिवार प्रणाली की शुरुआत हिंदू समाज में भी करें।