दो या, दो नेतृत्व शैलियाँ: अटल बिहारी वाजपेयी और नरेंद्र मोदी

कल दोपहर मेरे पुराने लिखे हुए एक लेख पर हम सब लोग आपस में बैठकर चर्चा कर रहे थे। यह लेख 20 वर्ष पहले लिखा गया था, जब अटल जी चुनाव हार गए थे। उस समय भी मेरा विचार था और आज भी मेरा विचार है कि अटल जी और नरेंद्र मोदी में बहुत फर्क है।

अटल बिहारी वाजपेई वास्तविक धर्मनिरपेक्ष थे, भ्रष्टाचार-विरोधी थे। वह उच्च स्तरीय सिद्धांतवादी थे। यही कारण था कि वह राजनीति में असफल हो गए, क्योंकि कोई भी बहुत शरीफ आदमी राजनीति में लंबे समय तक सफल नहीं हो पाता। दूसरी ओर, नरेंद्र मोदी व्यवहारिक हैं।

नरेंद्र मोदी ने मुस्लिम सांप्रदायिकता को चुनौती देने के लिए हिंदू सांप्रदायिकता के साथ तालमेल किया। नरेंद्र मोदी ने विपक्षी भ्रष्ट लोगों को जेल में डाला और बीजेपी के भ्रष्ट लोगों के साथ तालमेल किया। राजनीति का यही तकाज़ा है कि वह भ्रष्ट लोगों में या सांप्रदायिक लोगों में भी विभाजन करके ही अपनी राजनीति को आगे बढ़ा सकती है, और इस आधार पर नरेंद्र मोदी पूरी तरह सफल हैं।

जिस दिन विश्वास हो जाएगा कि मुसलमान अब बराबरी के आधार पर जीने के लिए तैयार हैं, वे भारतीय संविधान को मानते हैं, उसी दिन नरेंद्र मोदी हिंदू सांप्रदायिकता को भी चुनौती देंगे। ऐसा मुझे पूरा विश्वास है।

मैं अटल बिहारी वाजपेई की तुलना में नरेंद्र मोदी को अधिक सफल राजनेता मानता हूँ, क्योंकि अटल बिहारी वाजपेई अति उच्च आदर्शवादी थे और नरेंद्र मोदी व्यवहारिक हैं।