जफर सुरेशवाला की पहल और भारतीय मुसलमानों का नया चिंतन

कुछ दिन पहले जफर सरेशवाला के नेतृत्व में भारतीय मुसलमानों का एक प्रतिनिधिमंडल सरकार के साथ विचारों का आदान-प्रदान किया था। प्रतिनिधिमंडल ने भारत सरकार को मुसलमानों के संबंध में कुछ सलाह भी दी थी और सरकार ने भी उस पर विचार करने का आश्वासन दिया था। स्पष्ट है कि भारत का मुसलमान धीरे-धीरे इस बात को समझने लगा है कि उसे अब भारतीय मुसलमान बनकर ही रहना होगा।

दुनिया का मुसलमान इस्लाम की जो परिभाषा समझता है, वह परिभाषा भारत में नहीं चलेगी। इस्लाम अपने संगठन के विस्तार को ही अपनी सफलता मानता है, जबकि भारतीय अपने पारिवारिक और सामाजिक स्थिति की पहले चिंता करता है, धर्म की बाद में।

अभी भारतीय मुसलमान को इसी आधार पर सोचने में दिक्कत जरूर हो रही है, लेकिन सोचना ही होगा। भारत सरकार ने कई बार कहा है कि भारत धर्मशाला नहीं है। भारत के मुसलमान को यह बात गंभीरता से सोचनी होगी कि भारत शरीयत से नहीं, संविधान से चलेगा। यदि उन्हें संविधान की सर्वोच्चता पर विश्वास नहीं है तो वह कहीं भी जाने के लिए स्वतंत्र हैं।

आज पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के लोग जिस तरह भारत की तरफ देख रहे हैं, उससे भारत के मुसलमान की आंख खुल जानी चाहिए। एक तरफ तो पाकिस्तान और बांग्लादेश के मुसलमान भारत आने के लिए लाइन में खड़े हैं और दूसरी तरफ यहां धार्मिक स्वतंत्रता का रोना रोते हैं। यह नाटक अब नहीं चलेगा।

अब भारत में दोबारा शाहीन बाग आंदोलन नहीं होगा। अब भारत में दोबारा वक्फ के लिए धमकियां नहीं दी जाएंगी। अब भारत की जनता ने मुसलमान को यह साफ-साफ संदेश दे दिया है कि आपको यदि बराबरी के आधार पर रहना है तो भारत में रहिए, अन्यथा आप कहीं भी जाने के लिए स्वतंत्र हैं। हम यहां आपको धर्म के आधार पर विशेष अधिकार नहीं देंगे, बल्कि ऐसे विशेष अधिकारों में लगातार कटौती करते रहेंगे।

अब भारत नकली धर्मनिरपेक्षता को तिलांजलि दे चुका है और अब हम वास्तव में धर्मनिरपेक्ष रहने की घोषणा करते हैं।