अमेरिका, ईरान और भारत: मीडिया की भूमिका पर बहस

तीन-चार दिन पहले भारत के मीडिया में जोर-शोर से यह बात प्रचारित की गई कि अमेरिका ने एक भारतीय जहाज पर आक्रमण किया है और उस जहाज में तीन भारतीय कर्मचारी मारे गए हैं। यह बात आधी सत्य थी, आधी नहीं, क्योंकि अमेरिका ने किसी भारतीय जहाज पर हमला नहीं किया था, बल्कि किसी अन्य देश के जहाज पर हमला किया था, जिसमें तीन भारतीय कर्मचारी मारे गए थे।

दूसरी तरफ, उसके ठीक दूसरे दिन एक भारतीय जहाज अपने आप समुद्र में डूब रहा था और अमेरिका ने उस जहाज के 14 कर्मचारियों को बचाने में मदद की, लेकिन इस मामले में भारतीय मीडिया चुप रहा।

मैं इस बात को महसूस करता हूं कि भारत सरकार के लिए ईरान के पक्ष में झुकना उसकी मजबूरी है, लेकिन भारतीय मीडिया को ऐसी कोई मजबूरी नहीं है कि वह किसी के पक्ष में झुके। भारत सरकार जिस तरह दुनिया के सभी देशों के साथ संतुलन बनाकर चल रही है, वह हमारी सरकार के लिए बहुत अच्छा है। हम इसके खिलाफ नहीं हैं, लेकिन हम समाज के लोग इस बात के पक्ष में हैं कि हम पश्चिम के लोकतांत्रिक देशों को साम्यवादी देशों की तुलना में अधिक अच्छा मानते हैं।

साथ ही, हम इज़राइल को मुस्लिम देशों की तुलना में अधिक अच्छा मानते हैं। हम ईरान और फिलिस्तीन के पक्ष में खड़े नहीं हो सकते। हम रूस और चीन के भी पक्ष में खड़े नहीं हो सकते, क्योंकि हम लोकतांत्रिक हैं, हम धार्मिक हैं।

इसलिए मैं यह चाहता हूं कि भारत के मीडिया को भी लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष होना चाहिए।