कृत्रिम ऊर्जा बनाम मानवीय श्रम: आर्थिक संतुलन का प्रश्न

 

भारत सरकार की एक साफ-साफ ऊर्जा नीति होनी चाहिए। कृत्रिम ऊर्जा को मानवीय ऊर्जा का प्रतिस्पर्धी माना जाना चाहिए था, जो अब तक नहीं हुआ। बिजली और डीजल का रेट बढ़ा देना चाहिए था, लेकिन पूंजीपतियों और बुद्धिजीवियों के दबाव में डीजल, पेट्रोल और बिजली का रेट नहीं बढ़ाया जा रहा है। थोड़ा-सा दिखावे के लिए सरकार कभी-कभी बिजली का रेट बढ़ा देती है और पूंजीपति-बुद्धिजीवियों के दलाल उस बढ़ी हुई दर का विरोध करते हैं।

साफ-साफ बात है कि श्रम खरीदने वालों का अर्थव्यवस्था पर बहुत अधिक दबाव है और उन्हें श्रम बेचने वालों की कोई चिंता नहीं है। अगर डीजल, पेट्रोल और बिजली का थोड़ा-सा रेट बढ़ जाए, तो यह सब श्रम खरीदने वाले लोग आसमान सिर पर उठा लेते हैं, लेकिन अनाज, कपड़ा, दाल और कृषि-उत्पादन पर अगर टैक्स बढ़ जाए, तो उनकी जुबान बंद हो जाती है।

अब भारत सरकार को इस बात पर गंभीरता से विचार करना चाहिए कि हम विदेशों से डीजल-पेट्रोल नहीं खरीदेंगे। हम भारत के ही एथेनॉल अथवा सौर ऊर्जा से अपना काम चलाएंगे। हम एथेनॉल और सौर ऊर्जा को भी इतना महंगा रखेंगे कि श्रम पर बुरा प्रभाव न पड़े।

जिस दिन हम डीजल-पेट्रोल का आयात बंद कर देंगे, उसी दिन भारत की प्रगति बहुत तेज गति से होने लग जाएगी। मैं चाहता हूं कि सरकार बहुत तेज गति से डीजल-पेट्रोल का विकल्प खोजे और बिजली को भी इतना महंगा कर दे कि हम सौर ऊर्जा का अधिक उपयोग करने लग जाएं।