ममता बनर्जी की राजनीति और लोकतंत्र की ताकत

21 जून प्रातःकालीन सत्र

जिस तरह की पहले उम्मीद की जा रही थी, ठीक वैसा ही परिणाम बंगाल चुनाव का सामने दिख रहा है। विपक्ष की हिम्मत पूरी तरह टूट गई है। मुस्लिम सांप्रदायिकता की भी हिम्मत टूट चुकी है। दोनों ही अब टकराव के मूड में नहीं दिखते।

एकमात्र उम्मीद ममता बनर्जी से ही दिख रही थी, क्योंकि ममता बनर्जी बहुत दबंगई के साथ पूरे देश के खिलाफ खड़ी थीं। यहाँ तक कि ममता बनर्जी न केंद्र सरकार की परवाह करती थीं, न संविधान की, न सेना की, न न्यायपालिका की। उन्हें भरोसा था बांग्लादेश पर। उन्हें भरोसा था कि यदि बात ज्यादा बढ़ेगी तो हम बंगाल को स्वतंत्र कर देंगे। उन्हें भरोसा था कि मुसलमान अंत तक उनका साथ देंगे।

लेकिन ममता बनर्जी को जैसा लोकतांत्रिक झटका लगा, उस झटके को न ममता संभाल पाईं, न मुसलमान संभाल पाए, न विपक्ष संभाल पाया, और भारत की राजनीति सही दिशा में चल पड़ी है। कल नरेंद्र मोदी ने जो कुछ भी कहा, वह वास्तव में सच्चाई ही थी, लेकिन ममता बनर्जी का इस तरह समाप्त होना बहुत बड़ा बदलाव है।

ममता बनर्जी कम्युनिस्टों से भी आगे बढ़कर खतरनाक दिशा तक जा रही थीं। ममता बनर्जी को रोकना कोई आसान काम नहीं था। मैं तो ऐसा समझता हूँ कि नरेंद्र मोदी भी ममता का कुछ नहीं बिगाड़ पाए, लेकिन जिस तरह स्वाभाविक रूप से ममता घेर दी गईं, वह वास्तव में लोकतंत्र का ही कमाल है, अन्यथा सेना भी बंगाल को नियंत्रित नहीं कर पाती। बंगाल के चुनावों ने लोकतंत्र की ताकत सिद्ध कर दी है।

यह बात पूरी तरह सिद्ध हो गई है कि ममता बनर्जी बंगाल की शेरनी थीं। इसके पहले यह पद इंदिरा गांधी के पास था, लेकिन इंदिरा गांधी की तुलना में ममता बनर्जी बहुत आगे निकल गईं। इंदिरा गांधी को भी जनता ने धोखा दिया था, अन्यथा इंदिरा गांधी न चुनाव हारतीं, न सत्ता छोड़तीं, भले ही हजारों लोग मार दिए जाते। इंदिरा गांधी किसी लोकतंत्र को मानने वाली नहीं थीं।

ठीक यही हाल ममता बनर्जी का हुआ है। ममता बनर्जी को जब लगभग 12:00 बजे यह विश्वास हो गया कि अब वह चुनाव हार जाएँगी, सरकार नहीं बचेगी, तब एकाएक ममता शेरनी के समान आक्रमण के लिए तैयार हो गईं। तुरंत ही ममता ने यह भाषण दिया कि हम चुनाव जीत रहे हैं, हमारा बहुमत आ रहा है और इसमें किसी प्रकार का कोई संदेह नहीं है।

तुरंत ही वह मतगणना स्थल पर गईं और अपनी सोच के अनुसार शेर के समान मतगणना स्थल में जाकर घुस गईं, लेकिन उन्हें यह अंदाज़ नहीं था कि जो पुलिस वाले उनके सामने बकरी के समान "में-में" करते थे, वही पुलिस वाले उनको पीटने के लिए तैयार हो गए, धक्का देने लगे।

ममता उस समय मुख्यमंत्री थीं। उन्हें ज़रा भी उम्मीद नहीं थी कि इस तरह साधारण पुलिस वाले ममता के साथ दुर्व्यवहार करेंगे। और ममता के साथ यदि वहाँ दुर्व्यवहार नहीं होता, तो ममता अपना शेर के समान वहाँ ताकत का प्रयोग करतीं। उसका क्या परिणाम होता, यह तो पता नहीं, लेकिन ममता हार मानने वाली जीव नहीं थीं।

इसीलिए मैंने आज सवेरे लिखा कि ममता लोकतंत्र से हार गईं, ताकत से नहीं। आज ममता की जो दुर्दशा हो रही है, ममता के लोग सड़कों पर नहीं निकल पा रहे हैं। यदि आप ठीक से आकलन करें, तो इंदिरा गांधी की तुलना में ममता ज्यादा खतरनाक थीं। दोनों को एक साथ करके देखें, तो यह बात और स्पष्ट हो जाती है।