प्रश्नकर्ताओं की पहचान: जिज्ञासु, परीक्षक और विरोधी
6 जुलाई प्रातःकालीन सत्र
हमें आमतौर पर तीन तरह के प्रश्न करने वाले मिलते हैं। एक को हम मानते हैं जिज्ञासु, दूसरे को मानते हैं परीक्षक और तीसरे को मानते हैं विरोधी।
जिज्ञासु जो प्रश्न करते हैं, वे कुछ जानना चाहते हैं, समझना चाहते हैं, बताना नहीं। इस तरह के प्रश्नकर्ताओं को हमें यथार्थवादी उत्तर देना चाहिए, विस्तार से समझाना चाहिए।
जो परीक्षक होते हैं, वे हमारी योग्यता का आकलन करना चाहते हैं। इस प्रकार के लोगों को विस्तार की तुलना में तर्कसंगत और संक्षिप्त उत्तर देना चाहिए या उनसे प्रश्न करना चाहिए।
जो विरोधी हैं, उन्हें या तो टाल देना चाहिए अथवा उल्टा-सीधा उत्तर देना चाहिए। विरोधियों को उत्तर देने का कोई उपयोग नहीं है।
जो व्यक्ति इन तीनों को अलग-अलग पहचान लेता है, वही समझदार माना जाता है।
शिवशंकर जायसवाल, धीरज जैन सरीखे तीन-चार लोगों को मैं उत्तर नहीं देता, क्योंकि ये विरोधी हैं, समाज-बहिष्कृत हैं। इसलिए उन्हें उत्तर देने का कोई उपयोग नहीं है।
कुछ दूसरे मित्र भी हैं, जो मेरे धैर्य की परीक्षा लेते हैं, गालियाँ देते हैं, भद्दे-बड़े कमेंट करते हैं। उन सबको मैं तर्कसंगत उत्तर देता हूँ, टालता नहीं।
लेकिन कुछ ऐसे लोग हैं, जो बड़ी संख्या में हैं और जिज्ञासु हैं। वे कुछ जानना चाहते हैं। उन सबके उत्तर मैं विस्तार से देने का प्रयास करता हूँ।
वर्तमान समय में मेरा यह अनुभव है कि विरोधी भी धीरे-धीरे थक रहे हैं। जिज्ञासु लोग ही अधिक जुड़े हुए हैं। मुझे भी उत्तर देने में बहुत संतोष होता है और लाभ भी होता है।
मैं आप सबको भी यह सलाह देना चाहता हूँ कि आप जिज्ञासु, परीक्षक और विरोधी का अंतर करने की आदत डालिए।
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