क्या शिक्षा, स्वास्थ्य, धर्म और राजनीति अब सेवा नहीं, व्यवसाय हैं?

हम बहुत पुराने समय से शिक्षा, स्वास्थ्य, खेलकूद, नाटक, पत्रकारिता, राजनीति, धर्म—इन सबको समाज सेवा का माध्यम मानते रहे हैं। यह सारी सेवाएँ कभी व्यावसायिक नहीं रहीं, स्वैच्छिक थीं। हमारे मन में इन सबके प्रति भरपूर सम्मान रहा।

लेकिन वर्तमान कुछ वर्षों से यह सभी सेवाएँ व्यावसायिक हो गई हैं। चाहे वह खेलकूद हो, सिनेमा हो, नाटक हो, साहित्य हो, शिक्षा हो, स्वास्थ्य हो, राजनीति हो, धर्म हो या कोई भी अन्य क्षेत्र हो। यह सारी सेवाएँ वर्तमान समय में व्यापार बन गई हैं, फिर भी यह सब अपने को समाज सेवा के रूप में प्रचारित करते हैं, जबकि यह सब किसी भी रूप में समाज सेवा नहीं हैं।

सरकार भी इन सभी सेवाओं को सेवा कार्य मानकर मदद करती रहती है, जबकि इनका सेवा कार्य से कोई संबंध शेष नहीं बचा है।

अब समय आ गया है कि इन सब सेवाओं को व्यापार के रूप में मान्यता दी जाए। इनमें कोई भी सेवा ऐसी नहीं है जो व्यावसायिक न हो गई हो। इसलिए अब धीरे-धीरे समाज को इन सबके मामलों में प्रशिक्षित किया जाना चाहिए।