व्यक्ति, समाज और तंत्र: संविधान की सीमाओं पर पुनर्विचार

10 जुलाई प्रातःकालीन सत्र

दुनिया में व्यक्ति और समाज प्राकृतिक इकाइयाँ हैं। व्यक्ति सबसे पहली इकाई है और समाज सबसे अंतिम। दोनों के अपने-अपने स्वतंत्र अधिकार भी होते हैं और दोनों एक-दूसरे के साथ जुड़े हुए भी होते हैं। दोनों एक-दूसरे के पूरक होते हैं और एक-दूसरे पर निर्भर होते हैं। दोनों ही इकाइयों ने मिलकर व्यवस्था के रूप में एक तंत्र का निर्माण किया है।

तंत्र के दायित्व क्या होंगे और उसकी सीमाएँ क्या होंगी, यह सब कुछ समाज एक संविधान के माध्यम से तंत्र को देता है। इस तरह तंत्र का कार्य संविधान के दिए गए आदेश के अनुसार पालन करना होता है। समाज संविधान के माध्यम से तंत्र को सलाह नहीं देता, बल्कि आदेश देता है और तंत्र उसके पालन के प्रति जिम्मेदार माना जाता है।

संविधान बनाने वालों ने बहुत गलती की कि संविधान में धारा 35 से 51 तक जोड़ दी, जो वास्तव में तंत्र के लिए सलाह मात्र है। इन धाराओं ने तंत्र के दायित्व तो कम कर दिए, उल्टा तंत्र को समाज के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप के अवसर दे दिए। यह धारा 35 से 51 तक इसके लिए दोषी है कि तंत्र इन्हीं के माध्यम से समाज को गुलाम बनाने का प्रयास करता है।

हमारा दुर्भाग्य है कि बाद में तो संविधान में मूल कर्तव्य भी जोड़ दिए गए। भारत में ऐसे-ऐसे नासमझ हैं, जो मूल कर्तव्य संविधान में जोड़ते भी हैं और उनसे सहमत भी हैं। इन नासमझों को समझदार बनने की जरूरत है।

संविधान में जनकल्याणकारी कार्य और मूल कर्तव्य जैसी सभी धाराओं को तुरंत निकाल देना चाहिए या उन्हें बाध्यकारी बना दिया जाए।