रोजगार वृद्धि का आधार: उपभोक्तावाद नहीं, उत्पादन आधारित अर्थव्यवस्था
18 जुलाई प्रातःकालीन सत्र
हम लंबे समय से देख रहे हैं कि भारत के लोग रोजगार के लिए पश्चिम की तरफ बड़ी संख्या में जा रहे हैं। इनमें प्रतिभावान लोग भी हैं और मजदूर वर्ग के लोग भी हैं। दोनों ही तरह के लोग विदेश जा रहे हैं। स्पष्ट है कि भारत में आबादी जिस तरह बढ़ रही है, उस तरह रोजगार के अवसर नहीं बढ़ रहे हैं।
इसके प्रमुख कारणों पर भी हम लोगों ने विचार किया। हम लोगों ने यह पाया कि सबसे बड़ी समस्या भारत में उपभोक्तावाद की है। भारत में रोजगार उत्पादन से जुड़ा हुआ होता है। जब आप उत्पादन को प्रोत्साहित करेंगे, तब सभी प्रकार के लोगों के रोजगार के अवसर बढ़ेंगे।
लेकिन भारत की सरकारों ने हमेशा लोगों को सस्ता खाना, सस्ती शिक्षा, सस्ता अस्पताल और सस्ता कपड़ा देने की कोशिश की। इसका बुरा प्रभाव पड़ा। भारत में अस्पतालों की फीस घटाई गई, स्कूलों की फीस घटाई गई, अनाज और कपड़ा सस्ता रखा गया। उत्पादन पर इसका बुरा असर पड़ा और परिणाम यह हुआ कि देश का प्रतिभा पलायन हुआ। आरक्षण ने भी इस मामले में बहुत प्रभाव डाला है।
हम यह प्रयास करेंगे कि अब सब कुछ मुफ्त देना बंद कर दिया जाए। लोगों की क्रय शक्ति बढ़ाई जाए, उत्पादन बढ़ाया जाए, निर्यात बढ़ाया जाए और आयात को कम किया जाए। इससे हमारे देश के मजदूरों और बुद्धिजीवियों के रोजगार के अवसर बढ़ेंगे।
इसलिए हम नई नीति पर जन-जागरण कर रहे हैं कि सब कुछ निजीकरण कर दिया जाए। स्कूलों की फीस, अस्पतालों की फीस आदि सभी को स्वतंत्र कर दिया जाए।
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