अयोध्या से लोकव्यवस्था जागरण अभियान का राष्ट्रीय शंखनाद
अयोध्या से लोकव्यवस्था जागरण अभियान का राष्ट्रीय शंखनाद
25-26 जुलाई 2026 को अयोध्या धाम स्थित विवेक सृष्टि में आयोजित दो दिवसीय लोकव्यवस्था जागरण अभियान का प्रांतीय अधिवेशन अनेक दृष्टियों से ऐतिहासिक सिद्ध हुआ। प्रारंभिक रूप से इसे पूर्वी एवं मध्य उत्तर प्रदेश के 35 जिलों के प्रांतीय अधिवेशन के रूप में आयोजित किया गया था, किंतु देश के लगभग दस राज्यों से आए प्रतिनिधियों की सक्रिय सहभागिता ने इसे राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान कर दिया।
यह आयोजन केवल एक सम्मेलन नहीं था, बल्कि समाज की स्वशासी शक्तियों के जागरण, ज्ञान केंद्रों के विस्तार तथा संस्थागत ढांचे के निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव सिद्ध हुआ।
इस पूरे आयोजन की जिम्मेदारी निभाने में ज्ञान केंद्र योजना के प्रमुख श्री संजय तिवारी निरंतर धरातल पर सक्रिय रहे। उन्होंने आयोजन के प्रत्येक छोटे-बड़े पक्ष को समर्पण और धैर्य के साथ संभाला। रामानुजगंज से हमारे साथी रविंद्र विश्वास एवं लालबाबू रवि ने भी दिन-रात अथक परिश्रम कर यह सिद्ध कर दिया कि अभियान केवल विचारों से नहीं, बल्कि कर्मयोग से आगे बढ़ता है।
भोजन व्यवस्था की जिम्मेदारी सुल्तानपुर ज्ञान केंद्र के प्रभारी एवं हमारे वरिष्ठ साथी श्री सुधीर सिंह ने संभाली। लगभग 200 लोगों की अनुमानित व्यवस्था के बीच जब प्रतिभागियों की संख्या बढ़कर लगभग 450 तक पहुँच गई, तब भी उन्होंने अद्भुत धैर्य, सूझबूझ और सेवा-भाव के साथ सभी के भोजन की व्यवस्था संतोषपूर्वक सुनिश्चित की। अधिकांश प्रतिभागियों ने भोजन व्यवस्था की मुक्त कंठ से सराहना की। उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर कार्य करने वाले श्री अनिल मिश्रा की कर्मठता और सेवा-भाव ने भी सभी को प्रभावित किया।
कार्यक्रम स्थल विवेक सृष्टि ट्रस्ट की ओर से श्री शशांक जी का सहयोग पूरे आयोजन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। अनेक प्रशासनिक एवं व्यवस्थागत चुनौतियों के बीच उन्होंने चट्टान की तरह खड़े रहकर आयोजन को निर्बाध रूप से सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
पूर्वी उत्तर प्रदेश के प्रत्येक जिले तक अभियान पहुँचाने में गांधीवादी चिंतक श्री अनोखे लाल जी का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा। व्यक्तिगत जीवन में अत्यंत दुःखद परिस्थितियों, यहाँ तक कि अपनी बड़ी भाभी के निधन के बावजूद उन्होंने अपने सामाजिक दायित्वों से विचलित हुए बिना अभियान को प्राथमिकता दी। उन्होंने परिवार और समाज, दोनों के प्रति अपने उत्तरदायित्व का प्रेरणादायी उदाहरण प्रस्तुत किया।
चूँकि यह अधिवेशन मुख्यतः संस्थागत ढांचे के निर्माण और संगठन विस्तार को समर्पित था, इसलिए उसके वैचारिक पक्ष को संतुलित और सुव्यवस्थित दिशा देने का दायित्व ऋषिकेश के आदरणीय बृजेश राय ने संभाला। उन्होंने पूरे अधिवेशन की बैठकों का प्रभावी संचालन किया। वहीं मेरठ के आदरणीय नरेंद्र रघुनाथ सिंह ने व्यवस्था परिवर्तन के सैद्धांतिक पक्षों को अत्यंत सरल और तार्किक ढंग से प्रतिभागियों के समक्ष रखा।
कार्यक्रम में बक्सर (बिहार) से आचार्यकुल के राष्ट्रीय संयोजक आचार्य धर्मेंद्र तथा बलिया के श्री जे. पी. सिंह की गरिमामयी उपस्थिति ने प्रतिभागियों का विशेष मार्गदर्शन किया। उनके विचारों ने अभियान की दिशा, उद्देश्य और आवश्यकता को स्पष्ट किया। उन्नाव के श्री दिलीप मृदुल द्वारा देशी बीजों के संरक्षण पर प्रस्तुत विचार, भोपाल के अभिशेष अज्ञानी द्वारा निर्दलीय लोकतंत्र की अवधारणा तथा शिविराध्यक्ष श्री आर. के. पटेल द्वारा बजरंग मुनि जी के समाजनिष्ठ जीवन के संस्मरणों ने अधिवेशन को विशेष ऊँचाई प्रदान की।
यह अधिवेशन उन ऐतिहासिक संविधान मंथन शिविरों की भी स्मृति लेकर आया, जिनका आयोजन लगभग 1990 के दशक में बजरंग मुनि जी द्वारा रामानुजगंज और अंबिकापुर सहित अनेक स्थानों पर किया जाता था। उन शिविरों में डॉ. सुभाष कश्यप, रामबहादुर राय, अशोक गाडिया, आचार्य पंकज जैसे प्रख्यात विद्वानों का वैचारिक मंथन हुआ करता था। उन ऐतिहासिक शिविरों के प्रत्यक्ष सहभागी रहे वरिष्ठ साथियों में बदायूँ के आदरणीय बहादुर सिंह तथा बेगूसराय (बिहार) के आदरणीय जयशंकर कुमार की उपस्थिति ने अभियान की निरंतरता और वैचारिक परंपरा को जीवंत कर दिया।
दक्षिण भारत से डॉ. एम. एच. पाटिल (कर्नाटक), वीरास्वामी जी (हैदराबाद) तथा श्रीनिवास जी (तमिलनाडु) ने सहभागिता निभाकर स्पष्ट किया कि लोकव्यवस्था जागरण अभियान अब केवल उत्तर भारत तक सीमित नहीं रह गया है। इसी प्रकार ओडिशा से कमल महाप्रभु, दुर्गा प्रसाद होता, निरंजन होता तथा हमारे पुराने साथी सुवेंदु महापात्र, महाराष्ट्र से डॉ. प्रकाश किरकिरे और मध्य प्रदेश के पेंड्रा से सुचंद्र तिवारी अपने वरिष्ठ साथियों के साथ उपस्थित रहे। इन सभी की सक्रिय सहभागिता ने अधिवेशन को वास्तविक राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया।
गोरखपुर के गांधीवादी चिंतक राजपाल मिश्रा तथा मेरठ के श्री ओमपाल सिंह सहित अनेक वरिष्ठ साथियों की उपस्थिति और सक्रिय सहभागिता ने यह विश्वास मजबूत किया कि अब अभियान को राष्ट्रीय संस्थागत स्वरूप देने का समय आ गया है। इसी भावना के साथ अधिवेशन के दौरान केंद्रीय कार्यकारिणी के गठन की घोषणा की गई। इस निर्णय का सभी प्रतिनिधियों ने स्वागत किया और इसे अभियान की भावी दिशा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण कदम माना।
अधिवेशन की समीक्षा बैठक में अभियान के मार्गदर्शक एवं मौलिक विचारक आदरणीय बजरंग मुनि जी ने देशभर से आए प्रतिनिधियों की व्यापक सहभागिता को देखते हुए इस आयोजन को राष्ट्रीय अधिवेशन की संज्ञा दी। उन्होंने रांची, राजस्थान और दक्षिण भारत में प्रस्तावित प्रांतीय अधिवेशनों के उपरांत अगले राष्ट्रीय अधिवेशन के लिए वृंदावन का प्रस्ताव रखा।
अयोध्या का यह अधिवेशन केवल दो दिनों का कार्यक्रम नहीं था। यह उस वैचारिक यात्रा का नया अध्याय है, जो "समाज की स्वशासी शक्ति के जागरण, लोकशक्ति के संगठन तथा राज्य-निर्भरता से मुक्ति" के संकल्प के साथ आगे बढ़ रही है। इस अधिवेशन ने यह विश्वास और मजबूत किया कि यदि समाज संवाद, अध्ययन, संगठन और सेवा के माध्यम से स्वयं को पुनः संगठित करता है, तो "तंत्र-मुक्त संविधान, युक्त समाज व्यवस्था" का स्वप्न केवल विचार नहीं, बल्कि एक व्यवहारिक राष्ट्रीय अभियान बन सकता है।
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