बृजभूषण प्रकरण से उपचुनाव तक: भारतीय राजनीति के नए संकेत
यह बात शुरू से ही साफ-साफ दिख रही थी कि विनेश फोगाट ने बृजभूषण शरण सिंह को ब्लैकमेल करने के लिए इस तरह का झूठा आरोप लगाया है। मैंने इस संबंध में शुरू से ही यह बात साफ की थी और बाद में भी लिखा था कि यह आरोप पूरी तरह से गलत है कि बृजभूषण शरण सिंह ने कोई बल प्रयोग किया। या तो यह आरोप महिला होने के कारण ब्लैकमेलिंग के उद्देश्य से लगाया गया है अथवा दोनों के बीच कोई सहमति रही होगी। सच कुछ भी हो सकता है, लेकिन जिस तरह महिला होने का दुरुपयोग विनेश फोगाट ने किया और जिस तरह मेरे कई बार लिखने के बाद भी विपक्ष के नेताओं ने जंतर-मंतर पर जाकर बेशर्मी की, वह वास्तव में राजनीतिक चिंता का विषय नहीं है, सामाजिक चिंता का विषय है। समाज में इस प्रकार की प्रवृत्ति को बढ़ावा देना ठीक नहीं है। इस प्रकार की महिलाओं का मनोबल इसलिए बढ़ता है कि न्यायपालिका के लोग भी डर जाते हैं, लेकिन विनेश फोगाट मामले में पहली बार न्यायपालिका ने इस तरह खुलकर हिम्मत की है। अन्यथा वर्षों का इतिहास बताता है कि न्यायपालिका महिलाओं की तरफ झुक जाती है। अब विपक्ष को इस संबंध में अपनी नीति पर फिर से विचार करना चाहिए। विपक्ष ने बृजभूषण शरण सिंह को बदनाम करने के लिए सारी ताकत लगाई, लेकिन अंत में ब्लैकमेलिंग की पोल खुल गई।
आज तीन प्रदेशों के तीन उपचुनावों की मतगणना हुई, जिसमें बिहार और मध्य प्रदेश की दोनों सीटें भाजपा भारी बहुमत से हार गई। यह एक गंभीर प्रश्न है क्योंकि दोनों जगह भारतीय जनता पार्टी की सरकार है। ये दोनों चुनाव परिणाम यह संकेत देते हैं कि या तो ब्राह्मणों की नाराजगी का दुष्प्रभाव पड़ा है अथवा जंतर-मंतर के युवा आंदोलन का भी प्रभाव हो सकता है। किस बात का प्रभाव पड़ा, यह तो धीरे-धीरे पता चलेगा, लेकिन दोनों ही बातों का प्रभाव हो सकता है। एक तीसरी बात भी हो सकती है कि बंगाल तक जिस तरह भारतीय जनता पार्टी आगे बढ़ रही थी, उसमें संघ का योगदान बहुत अधिक था, जबकि इन उपचुनावों में भारतीय जनता पार्टी लड़ रही थी, संघ लगभग निष्क्रिय था। संघ ने इन चुनावों में कोई प्रत्यक्ष हस्तक्षेप नहीं किया। फिर भी इन दोनों चुनावों की हार के बाद आगे और अधिक नए जातीय समीकरण बनाने की आवश्यकता है। यह बात भी साफ है कि इसके पहले के सभी चुनाव हिंदू-मुसलमान पर केंद्रित होते थे और ये उपचुनाव हिंदुओं के अंदर ही विभाजन में सक्रिय हुए। ये हिंदू-मुसलमान पर केंद्रित नहीं हो सके। इस संबंध में राजनीतिक दल अपनी-अपनी समीक्षा करेंगे, लेकिन ये नए संकेत जरूर देते हैं।
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