स्वतंत्रता और सहजीवन के संतुलन की दिशा में नया प्रयोग

5 सितंबर प्रातःकालीन सत्र।

हम अब तक जिस शासन व्यवस्था में चल रहे हैं, उसमें केंद्रीयकरण अधिक महत्वपूर्ण है। सत्ता ऊपर से नीचे आती है, व्यवस्था भी ऊपर से नीचे आती है। एकता में अनेकता का संदेश दिया जाता है। यह माना जाता है कि हम हर मामले में एकजुट रहेंगे और एकजुट होकर जो निर्णय देंगे, वह नीचे वालों की स्वतंत्रता की सीमा होगी। इसे एकता में अनेकता कहा गया है।

लेकिन हम लोग इस व्यवस्था में बदलाव चाहते हैं। हम चाहते हैं कि अनेकता में एकता हिंदू की विशेषता। हिंदुओं ने कभी एकता में अनेकता नहीं देखी, बल्कि अनेकता में एकता देखी है। इसका मतलब यह है कि सभी इकाइयां अपने-अपने तरीके से कार्य करने के लिए स्वतंत्र होंगी और वे सब मिलकर एक निर्णय करेंगी। जो निर्णय करेंगी, वह निर्णय सब पर लागू होगा, लेकिन निर्णय करने वाली सभी इकाइयां अपनी-अपनी स्वतंत्रता से निर्णय करेंगी। कोई निर्णय किसी पर बिना सहमति के थोपा नहीं जाएगा।

इस तरह हम इस्लाम या साम्यवादी संस्कृति से भिन्न संतुलनवादी हिंदुत्व की संस्कृति के पक्षधर हैं। हम प्रत्येक इकाई को अधिकतम स्वतंत्रता देना चाहते हैं और ऐसी सभी इकाइयां एक साथ मिलकर ऊपर की इकाई बना सकती हैं, जिसका निर्णय सब मानेंगे। इस तरह हम स्वतंत्रता और सहजीवन का तालमेल देखना चाहते हैं।

हम वर्तमान समय में इसी प्रयोग को आगे बढ़ा रहे हैं। मेरा दुनिया से निवेदन है कि वह अनेकता में एकता की दिशा में आगे बढ़े।