भूल का दंड अलग, अपराध का दंड अलग

12 सितंबर प्रातःकालीन सत्र। मैंने अपनी पुरानी भारतीय व्यवस्था में यह एक अच्छाई देखी थी कि उसमें योग्यता अनुसार व्यक्तियों को महत्व दिया जाता था। वर्ण व्यवस्था इस प्रकार बनी हुई थी कि योग्यता, क्षमता और नियत में तालमेल रहता था। जिन्हें भी विशेष अधिकार प्राप्त थे, उन्हें यदि भूल करते थे तो उन्हें अन्य लोगों की तुलना में कम दंड दिया जाता था और यदि वे जानबूझकर कोई अपराध करते थे तो अन्य लोगों की तुलना में अधिक दंड दिया जाता था। मैं इसे एक अच्छी प्रणाली मानता हूं।

पुराने जमाने में मार्गदर्शक, रक्षक, पालक, सेवक वर्ग बने हुए थे। इनमें यदि मार्गदर्शक कोई भूल करता था तो उसे एक दंड होता था और मार्गदर्शक कोई अपराध करता था तो उसे चार गुना दंड होता था, जबकि सेवक अगर भूल करता था तो चार गुना दंड होता था और अपराध करता था तो एक गुना दंड होता था। इस तरह भूल के लिए सेवक को चार और अपराध के मामले में एक दंड था, जबकि मार्गदर्शक को भूल के मामले में एक और अपराध के मामले में चार गुना अधिक दंड दिया जाता था।

मैं अब भी समझता हूं कि यदि किसी को विशेष अधिकार प्राप्त है तो उसे भूल के मामले में माफ किया जा सकता है, अपराध के मामले में कठोर दंड दिया जाना चाहिए। हमारी वर्तमान राजनीतिक और संवैधानिक व्यवस्था भूल और अपराध को अलग-अलग नहीं कर पा रही है। इसके कारण बहुत दिक्कत पैदा हो रही है। हम नई व्यवस्था में भूल और अपराध को बिल्कुल अलग-अलग करके देखेंगे और साथ में विशेष अधिकार प्राप्त लोगों को सामान्य लोगों की तुलना में कुछ विशेष व्यवहार करेंगे। इसका अर्थ यह है कि एक ही प्रकार के अपराध के लिए सेवक को यदि 10 वर्ष का दंड दिया जाता है तो मार्गदर्शक को फांसी भी दी जा सकती है, लेकिन यदि किसी भूल में सेवक को 10 कोड़े की सजा दी जाती है तो मार्गदर्शक को सिर्फ निंदा करके ही छोड़ा जा सकता है।

मैंने भूल और अपराध दोनों के अंतर पर लिखा था। मेरा यह मानना है कि वर्तमान समय में हम भूल को बहुत गंभीर अपराध बना रहे हैं और वास्तविक अपराधों को छोटा मानकर देख रहे हैं। मैंने खुद देखा है कि उपहार सिनेमा कांड में हमारा प्रशासन और न्यायपालिका ने जितने कठोर व्यवहार किया, उतनी कठोरता उचित नहीं थी, क्योंकि उपहार सिनेमा का मामला एक गलती थी। उसका दंड साधारण होना चाहिए था। दूसरी ओर बेअंत सिंह की हत्या एक गंभीर अपराध था। अपराधी को तुरंत फांसी होनी चाहिए थी, लेकिन आपने वहां मानवता का व्यवहार किया।

गलती और अपराध को यदि आप इस प्रकार अलग-अलग नहीं करेंगे तो भविष्य में अपराध बढ़ते ही जाएंगे। अभी आपने दो-तीन दिन पहले ही सुना होगा कि पंजाब में किसी सिख ने किसी व्यक्ति से ₹10 के झगड़े पर तलवार से उसका हाथ काट दिया। यह अपराध था, भूल नहीं थी। लेकिन दूसरी ओर दिल्ली में एक बिल्डिंग गिर जाती है। बिल्डिंग को बनाने वाले ने गलती की थी। उस गलती का दंड मिलना चाहिए था, लेकिन आप उसके साथ इतना कठोर व्यवहार कर रहे हैं, जैसे कि उसने कोई गंभीर अपराध कर दिया हो।

इसलिए हमें अपनी नीतियों पर फिर से विचार करना चाहिए। भूल और अपराध, ये दोनों अलग-अलग होते हैं और दोनों के बीच में अंतर बनाए रखना उचित है।