वर्तमान विश्व-व्यवस्था में राज्य और सरकार जैसे शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण हो गए हैं।

20 जनवरी, प्रातःकालीन सत्र
वर्तमान विश्व-व्यवस्था में राज्य और सरकार जैसे शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण हो गए हैं। किंतु मैं इस विषय पर वर्षों से विचार करता आ रहा हूँ कि राज्य का वास्तविक अर्थ क्या है, सरकार किसे कहते हैं, और राज्य-व्यवस्था से हमारा तात्पर्य क्या होना चाहिए। इन सभी शब्दों के बीच मूलभूत अंतर क्या है—यह स्पष्ट होना आवश्यक है।
हम जिन प्रतिनिधियों को चुनकर भेजते हैं, वे सरकार होते हैं या राज्य का प्रतिनिधित्व करते हैं, या फिर किसी व्यवस्था का हिस्सा होते हैं? यदि ये तीनों ही हैं, तो फिर संविधान की भूमिका क्या है? इन प्रश्नों पर गंभीरता से विचार करना आवश्यक है, क्योंकि यदि सरकार, राज्य, व्यवस्था या संविधान—इनमें से कोई भी असफल सिद्ध होता है, तो दोष किसे दिया जाए और विचार किस पर केंद्रित किया जाए?
आज यदि विश्व की समूची व्यवस्था गड़बड़ प्रतीत हो रही है, तो उसका उत्तरदायित्व किसी न किसी पर तय करना ही पड़ेगा। किंतु मैं अब तक यह निश्चित नहीं कर पाया हूँ कि इस पूरे परिदृश्य में संविधान दोषी है, सरकार दोषी है, राज्य दोषी है या फिर पूरी व्यवस्था ही दोषपूर्ण है। साथ ही, इन चारों के बीच वास्तविक अंतर क्या है—यह भी स्पष्ट नहीं हो सका है।
बहुत सोच-विचार के बाद भी जब कोई ठोस निष्कर्ष नहीं निकला, तो मैंने इन सभी को अलग-अलग करके देखने का निर्णय लिया। मेरे विचार से हमारी संपूर्ण व्यवस्था संविधान से संचालित होती है। इसका अर्थ यह हुआ कि संविधान ही व्यवस्थापक है। संविधान एक तंत्र का निर्माण करता है, और वही तंत्र राज्य कहलाता है। यह तंत्र एक सरकार का गठन करता है, और वह सरकार संविधान के अंतर्गत, उसी तंत्र के निर्देशों का पालन करते हुए कार्य करती है।
फिर भी, मैं चाहता हूँ कि हम सभी मिलकर इन परिभाषाओं पर गंभीर विचार-मंथन करें और यह स्पष्ट करें कि संविधान, राज्य, सरकार और व्यवस्था—इनमें से प्रत्येक में क्या-क्या तत्व होने चाहिए और इनके बीच संबंध किस प्रकार परिभाषित किया जाना चाहिए।