कुछ वर्षों से न्यायपालिका में भी सकारात्मक परिवर्तन देखने को मिल रहा है।

भारत में राजनीतिक बदलाव तो स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है, लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि पिछले कुछ वर्षों से न्यायपालिका में भी सकारात्मक परिवर्तन देखने को मिल रहा है। अब न्यायपालिका से साम्यवादी विचारधारा से जुड़े लोग धीरे-धीरे बाहर होते जा रहे हैं और उनके स्थान पर यथार्थवादी दृष्टिकोण रखने वाले लोग आ रहे हैं।
जो प्रशांत भूषण, कपिल सिब्बल या कुछ अन्य लोग पहले न्यायपालिका में दादागिरी किया करते थे, आज उन्हें काफी परेशानी हो रही है, क्योंकि न्यायपालिका पर से वामपंथियों का प्रभाव लगातार कम हो रहा है। हाल ही में आपने संभल की घटना देखी होगी, जहाँ एक न्यायाधीश ने मनमानी करते हुए पुलिस पर अनावश्यक आदेश जारी किया। लेकिन उच्च न्यायालय ने तत्काल संज्ञान लेते हुए कार्रवाई की और उस न्यायाधीश का स्थानांतरण कर दिया।
आश्चर्य की बात यह है कि गिने-चुने वामपंथी अधिवक्ता उच्च न्यायालय का विरोध कर रहे हैं, नए आने वाले न्यायाधीश का विरोध कर रहे हैं, सरकार का विरोध कर रहे हैं और पुलिस का भी विरोध कर रहे हैं। वास्तविकता यह है कि उनकी दुकानदारी पर असर पड़ रहा है, इसी कारण वे इतना विरोध कर रहे हैं।
मुझे यह भी जानकारी है कि उच्च न्यायालय बिना गहन विचार-मंथन के किसी न्यायाधीश का स्थानांतरण नहीं करता। यह भी संभव है कि संबंधित न्यायाधीश को इस बात का आभास रहा हो और उसने इस घटना को उजागर करने के उद्देश्य से ऐसा आदेश पारित किया हो। जो भी हो, सच्चाई भविष्य में सामने आ जाएगी, लेकिन जनता के सामने यह बात अब स्पष्ट हो गई है कि न्यायपालिका में कम्युनिस्ट और वामपंथी वकीलों तथा न्यायाधीशों का प्रभाव कमजोर होता जा रहा है।
यह एक शुभ संकेत है।