इसी कारण हम नई व्यवस्था में इस समीकरण को बदलना चाहते हैं।

30 जनवरी, प्रातः कालीन सत्र
हम इस निष्कर्ष तक पहुँच चुके हैं कि भारत में कुल 11 ऐसी समस्याएँ हैं जो स्वतंत्रता के बाद से लगातार बढ़ती चली आ रही हैं। इन समस्याओं को हम दो वर्गों में विभाजित कर सकते हैं—
पहला वर्ग अपराधिक समस्याओं का है, जिनकी संख्या पाँच है।
दूसरा वर्ग सामाजिक समस्याओं का है, जिनकी संख्या छह है।
पाँच अपराधिक समस्याओं को रोकने की ज़िम्मेदारी राज्य अर्थात सरकार की थी, जबकि छह सामाजिक समस्याओं को नियंत्रित करने की क्षमता और उत्तरदायित्व समाज के पास होना चाहिए था। लेकिन दुर्भाग्यवश राज्य ने अपनी मूल जिम्मेदारियों को छोड़कर सामाजिक समस्याओं में अनावश्यक और अत्यधिक हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया।
इसका परिणाम यह हुआ कि जिन छह सामाजिक समस्याओं को समाज स्वयं संभाल सकता था, वे लगातार बढ़ती चली गईं। वहीं जिन पाँच अपराधिक समस्याओं को राज्य को सख्ती से रोकना चाहिए था, वे भी नहीं रुकीं।
आज स्थिति यह है कि स्वतंत्रता के बाद से सभी 11 समस्याएँ निरंतर बढ़ रही हैं—
पाँच समस्याएँ इसलिए बढ़ रही हैं क्योंकि राज्य उन्हें रोकने में विफल रहा है,
और छह समस्याएँ इसलिए बढ़ रही हैं क्योंकि राज्य उनमें अनावश्यक हस्तक्षेप कर रहा है।
इन सभी समस्याओं का मूल कारण यह है कि वर्तमान भारत में राज्य सर्वशक्तिमान हो गया है और समाज की शक्ति को लगभग शून्य कर दिया गया है। समाज एक प्रकार से परजीवी बन गया है, जिसे हर छोटे-बड़े कार्य के लिए राज्य की ओर देखने की आदत पड़ गई है।
इसी कारण हम नई व्यवस्था में इस समीकरण को बदलना चाहते हैं।
हम चाहते हैं कि सामाजिक मामलों में राज्य की हस्तक्षेप करने की शक्ति सीमित हो और समाज को पुनः सक्रिय, सक्षम और उत्तरदायी बनने का अवसर मिले।
यही इन समस्याओं का मूल समाधान है।
आगे चलकर हम संसदीय लोकतंत्र को सहभागी लोकतंत्र में परिवर्तित करना चाहते हैं, जहाँ राज्य और समाज दोनों मिलकर समस्याओं का समाधान करेंगे।
मुझे पूर्ण विश्वास है कि यदि यह परिवर्तन किया गया, तो ये सभी 11 समस्याएँ निश्चित रूप से कम हो सकती हैं।