यूजीसी से जुड़े जिस प्रकार के घटनाक्रम सामने आए, वे मेरे लिए किसी स्वप्न जैसे थे। हर क्षण परिस्थितियाँ बदलती रहीं।
पिछले तीन–चार दिनों से यूजीसी से जुड़े जिस प्रकार के घटनाक्रम सामने आए, वे मेरे लिए किसी स्वप्न जैसे थे। हर क्षण परिस्थितियाँ बदलती रहीं। मैं यह समझ ही नहीं पा रहा था कि क्या हो रहा है, क्यों हो रहा है, कौन कर रहा है और इसका परिणाम क्या होगा। जब तक मैं किसी एक निष्कर्ष पर पहुँचने की कोशिश करता, तब तक पूरा वातावरण ही बदल चुका होता था।
कल इस पूरे घटनाक्रम का पटाक्षेप हुआ। तभी यह बात कुछ हद तक स्पष्ट होने लगी कि यह पूरा मामला दो प्रमुख खिलाड़ियों के बीच शह–मात के खेल की तरह चल रहा था। एक ओर दिग्विजय सिंह थे और दूसरी ओर नरेंद्र मोदी। दिग्विजय सिंह के साथ समूचा कम्युनिस्ट वर्ग खड़ा था, जबकि नरेंद्र मोदी के साथ कुछ सवर्ण बुद्धिजीवी दिखाई दे रहे थे।
कभी ऐसा प्रतीत होता था कि दिग्विजय सिंह की टीम भारी पड़ रही है, लेकिन अब स्पष्ट दिख रहा है कि उनकी टीम पूरी तरह चारों खाने चित हो चुकी है। मोदी की टीम ने उन्हें निर्णायक रूप से पराजित कर दिया है।
मैं यह निश्चित रूप से नहीं कह सकता कि नरेंद्र मोदी ने यह सब पूर्व नियोजित रणनीति के तहत किया, या यह घटनाएँ स्वाभाविक रूप से घटती रहीं, या फिर उन्होंने परिस्थितियों के अनुसार तत्काल नीतिगत सुधार किए। कारण जो भी रहा हो, परिणाम स्पष्ट है—मैदान में कम्युनिस्ट और दिग्विजय सिंह पूरी तरह परास्त हो चुके हैं।
इसके साथ ही वे अवर्ण बुद्धिजीवी, जो स्वयं को इस संघर्ष में मजबूत स्थिति में देख रहे थे, अब उन्हें भी अपने नुकसान का आभास होने लगा है।
मेरे विचार से जिस सुप्रीम कोर्ट को माध्यम बनाकर इस मुद्दे को पुनर्जीवित किया गया था, उसी सुप्रीम कोर्ट को माध्यम बनाकर सरकार ने इस पूरे प्रकरण को अंततः श्मशान तक पहुँचा दिया।
इस पूरे टकराव से समाज को एक महत्वपूर्ण लाभ अवश्य हुआ है—अब आरक्षण पर एक नई बहस की शुरुआत होगी। अब तक आरक्षण के जिस समाधान को अंतिम मान लिया गया था, उसके अतिरिक्त किसी अन्य वैकल्पिक समाधान पर भी चर्चा आरंभ होगी। संभव है कि उस दीर्घकालिक समाधान पर भी संवाद शुरू हो, जिसके बारे में हम लोग लंबे समय से सोचते आ रहे हैं।
मैं आज भी यही मानता हूँ कि आरक्षण का वास्तविक और दीर्घकालिक समाधान श्रम और बुद्धि के बीच बढ़ती हुई खाई को पाटने के अतिरिक्त और कुछ नहीं हो सकता। अब देखना यह है कि इस विचार को चर्चा के केंद्र में आने में कितना समय लगता है।
इन सभी घटनाओं के कारण मैं तीन–चार दिनों तक मानसिक रूप से बहुत व्यथित रहा, लेकिन अब जब परिणाम सामने आया है, तो मुझे गहरी प्रसन्नता का अनुभव हो रहा है।
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