व्यवस्था एक ऐसा सिस्टम है, जिसके अंतर्गत सरकार कार्य करती है।

तंत्र और सरकार—इन दोनों में क्या अंतर है, इस विषय पर हम आज चर्चा नहीं करेंगे। लेकिन हम यह अवश्य स्पष्ट करना चाहते हैं कि व्यवस्था और सरकार दोनों अलग-अलग अवधारणाएँ हैं।
व्यवस्था एक ऐसा सिस्टम है, जिसके अंतर्गत सरकार कार्य करती है।
हमारी जो संवैधानिक व्यवस्था बनाई गई, उसके मूल स्वरूप में ही अनेक गंभीर त्रुटियाँ रह गईं। ज़रा विचार कीजिए—संविधान के ढाँचे में जाति और धर्म को मान्यता दे दी गई, जबकि परिवार और गाँव जैसी मूल सामाजिक इकाइयों को व्यवस्था से बाहर कर दिया गया। यह एक बड़ी चूक थी।
यह समझ से परे है कि कैसे-कैसे अयोग्य लोग संविधान निर्माण समिति में शामिल हो गए, जिन्हें यह बुनियादी समझ भी नहीं थी कि समाज और राज्य दो अलग-अलग चीज़ें होती हैं।
गंभीरता से सोचिए—छुआछूत रोकना समाज का कार्य है, जबकि आतंकवाद रोकना सरकार का कार्य है।
विडंबना यह है कि आतंकवाद रोकने के लिए लोगों को बंदूक का लाइसेंस दिया जाने लगा और छुआछूत रोकने के लिए लोगों को जेलों में डाला जाने लगा।
छुआछूत रोकने की क्या आवश्यकता थी? छुआछूत समाज स्वयं रोक सकता था, जातीय भेदभाव समाज रोक सकता था, धार्मिक भेदभाव भी समाज ही समाप्त कर सकता था। सरकार को चाहिए था कि वह स्वयं को केवल अपराध नियंत्रण और आंतरिक सुरक्षा तक सीमित रखती।
इसीलिए आज आवश्यकता सत्ता परिवर्तन पर सोचने की नहीं, बल्कि व्यवस्था परिवर्तन पर गंभीरता से विचार करने की है।
हमारी समस्या सरकार नहीं है, हमारी समस्या दोषपूर्ण संवैधानिक व्यवस्था है।
जातिवाद, सांप्रदायिकता, छुआछूत, चरित्र पतन, श्रम शोषण और महिला उत्पीड़न—ये सभी सामाजिक विकृतियाँ हैं और इन्हें रोकना समाज का दायित्व है, सरकार का नहीं।
इसलिए हम ऐसी नई संवैधानिक व्यवस्था के पक्षधर हैं, जिसमें समाज और सरकार दोनों की भूमिकाएँ पूरी तरह स्पष्ट हों, और कोई भी एक-दूसरे के क्षेत्र में अनावश्यक हस्तक्षेप न करे।