राम मंदिर से ब्राह्मण पूज्य तक: अखिलेश यादव की नई राजनीतिक दिशा

अखिलेश यादव बहुत जिम्मेदार विपक्षी नेता माने जाते हैं। उन्होंने कुछ दिन पहले ही राम मंदिर के दान में घपले की शिकायत की। मैं इस बात की चर्चा नहीं कर रहा कि घपला हुआ या नहीं, वह विषय अलग है। लेकिन वर्तमान राजनीतिक वातावरण में अखिलेश यादव राम मंदिर की इतनी चिंता कर रहे हैं, यह अवश्य ही आश्चर्यजनक है। अखिलेश यादव असफल शंकराचार्य, अभी मुक्तेश्वरानंद की शरण में भी जा रहे हैं।

राम मंदिर में घपला हुआ या नहीं हुआ, इस विषय पर कई वर्षों से चर्चा चलती रही है। आम आदमी पार्टी के गैर-जिम्मेदार नेता संजय सिंह, शिवसेना के संजय राउत, कांग्रेस पार्टी के दिग्विजय सिंह सरीखे कुछ आलतू-फालतू लोग तो दिन-रात इस प्रकार की बातें करते रहते हैं। लेकिन मुस्लिम-यादव पक्ष के अखिलेश यादव ने यह बात कहकर स्पष्ट कर दिया है कि अब विपक्ष राम मंदिर की बहुत चिंता कर रहा है, क्योंकि विपक्ष को यह बात अच्छी तरह मालूम हो गई है कि राजनीति में रहना है तो हिंदुओं का साथ लेना ही पड़ेगा।

अखिलेश यादव ने नई राह पकड़ ली है। अरविंद केजरीवाल लंबे समय से इस दिशा में सोच रहे हैं और मजबूर होकर राहुल गांधी को भी इस दिशा में सोचना ही पड़ेगा। भारतीय संस्कृति को त्यागकर किसी विदेशी संस्कृति के आधार पर भारत में राजनीति को जीवित रखना अब संभव नहीं है।

फिर भी, मेरे विचार से अखिलेश यादव ने जिस तरह शुरुआत की है, वह अच्छी शुरुआत नहीं है। राम मंदिर में भ्रष्टाचार की अपेक्षा अखिलेश यादव ने जो ब्राह्मण-पूज्य की लाइन पकड़ी थी, वह अधिक कारगर हो सकती थी।