स्वतंत्रता और उद्दंडता के बीच की प्राकृतिक सीमा
29 जुलाई प्रातःकालीन सत्र।
वर्तमान दुनिया में स्वतंत्रता और उद्दंडता के बीच या तो कोई सीमा रेखा बनी हुई नहीं है या जो बनी हुई है, वह गलत है। हमारा इस संबंध में विचार है कि स्वतंत्रता और उद्दंडता के बीच एक प्राकृतिक रूप से सीमा रेखा बनी हुई है। इस सीमा रेखा को हम मौलिक अधिकार मानते हैं। उस सीमा रेखा का उल्लंघन न किसी व्यक्ति को करना चाहिए, न ही किसी अन्य सामाजिक इकाई को। सरकार और संविधान भी उस सीमा रेखा में बदलाव नहीं कर सकते।
लेकिन व्यक्ति की सहमति से कोई भी इकाई एक नई सीमा रेखा बना सकती है। उस सीमा रेखा में प्रत्येक व्यक्ति की सहमति होना अनिवार्य है। इसका यह अर्थ हुआ कि कोई भी परिवार अपने परिवार में स्वतंत्रता और उद्दंडता की अलग सीमा बना सकता है। जिस तरह यह अधिकार परिवार को है, उसी तरह गांव को भी है, जिले को भी है, प्रदेश को भी है, राष्ट्र सभा को भी है और उसी तरह विश्व समाज को भी है।
इस तरह स्वतंत्रता और उद्दंडता के बीच नई सीमा रेखा का निर्धारण प्रत्येक व्यक्ति की सहमति से ही हो सकता है। अन्यथा जो प्राकृतिक रूप से बनी हुई सीमा रेखा है, वही सीमा रेखा सबको मानना बाध्यकारी होगा। उद्दंडता की अगर कोई अलग परिभाषा मनमाने तरीके से बनाई जाती है, वह गलत है। हम नए नियमों के अंतर्गत ऐसी परिभाषा को अमान्य कर देंगे।
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