नेहरू की गलतियों पर चर्चा करें, निजी जीवन पर नहीं

कल हमारे भाजपा के एक सांसद ने संसद में पंडित नेहरू को अय्याश कहा। मैंने इस शब्द पर बहुत सोचा। मुझे यह समझ में नहीं आया कि इस शब्द का प्रयोग कितना आवश्यक था, कितना उचित था और कितना सही था। यदि इन तीनों बातों पर विचार करें, तो यह बात सही है, लेकिन इस शब्द का प्रयोग संसद में करना उचित नहीं था। आवश्यकता तो बिल्कुल थी ही नहीं, क्योंकि व्यक्तिगत आरोपों का महत्व उस समय होता है, जब आरोप लगाने वाला कमजोर रहता है और जिस पर आरोप लगाया जा रहा है, उसके अन्य कार्यों पर आरोप लगाने की कोई गुंजाइश नहीं होती।

मुझे याद है कि जब नेहरू, इंदिरा अथवा गांधी परिवार के लोग बहुत शक्तिशाली थे और उन पर किसी प्रकार के आरोप लगाना संभव नहीं था, उस स्थिति में संघ या सावरकरवादी इस प्रकार के व्यक्तिगत आरोप लगाते थे और लोग इस प्रकार के आरोपों का मजा लेते थे। लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में, जब भारतीय जनता पार्टी, नरेंद्र मोदी और संघ इतने ताकतवर हैं, तो ऐसे वातावरण में नेहरू, इंदिरा गांधी या अन्य किसी भी व्यक्ति पर व्यक्तिगत आरोप लगाना न उचित है, न आवश्यक।

अय्याशी शब्द यदि खोजा जाए, तो अनेक लोगों में इस प्रकार की कमी मिल सकती है। वर्तमान में नेहरू परिवार अथवा विपक्षी नेता बहुत कमजोर हो चुके हैं और यही कारण है कि वे नरेंद्र मोदी अथवा अन्य लोगों पर व्यक्तिगत आरोप लगाते हैं। मैं यह नहीं कह रहा कि नरेंद्र मोदी पर लगाए गए व्यक्तिगत आरोप सच हैं या झूठ, लेकिन मैं यह जरूर कह सकता हूँ कि इस प्रकार के व्यक्तिगत आरोप कमजोर व्यक्ति ही लगाता है, मजबूत नहीं।

वर्तमान भारत में, जब नेहरू की सामाजिक और राजनीतिक गलतियों के भंडार भरे पड़े हैं, तो व्यक्तिगत आरोप लगाने की गंदगी से बचना चाहिए।