नरेंद्र मोदी, नीतीश कुमार और अरविंद केजरीवाल: तीन राजनीतिक मार्गों का तुलनात्मक विश्लेषण
15 वर्ष पहले, जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री नहीं बने थे, उस समय मैंने कई लेख लिखकर यह बात साफ की थी कि भारत में प्रधानमंत्री बनने की योग्यता सिर्फ तीन व्यक्तियों में दिखाई देती है। उनमें सबसे पहले हैं नरेंद्र मोदी, दूसरे नंबर पर हैं नीतीश कुमार और तीसरे नंबर पर हैं अरविंद केजरीवाल। इन तीनों के अतिरिक्त चौथा तो उस समय कोई दिखाई नहीं देता था और राहुल गांधी में तो प्रधानमंत्री बनने की शून्य से अधिक योग्यता ही नहीं थी। यह बात मैंने कई बार लिखी। आज भी मैं अपनी बात पर दृढ़ हूँ।
आज भी नरेंद्र मोदी ऐसे एकमात्र व्यक्ति हैं, जो संगठन की ताकत पर देश में बदलाव लाना चाहते हैं। वे इस दिशा में सफल भी हैं। दूसरी ओर नीतीश कुमार हैं, जो संसदीय लोकतंत्र के आधार पर देश में बदलाव लाना चाहते हैं। वे अपनी क्षमता अनुसार सफल रहे। आज अगर नीतीश कुमार की गणना की जाए, तो राजनेताओं में उनकी योग्यता सबसे सफल मानी जा रही है।
तीसरा स्थान अरविंद केजरीवाल का है, जिनका न संसदीय लोकतंत्र पर विश्वास है, न संगठन पर विश्वास है। उनका विश्वास सड़क पर है। उनको विश्वास आंदोलन में है, भीड़तंत्र में। वे भी अपने तरीके से नए-नए प्रयोग कर रहे हैं। इसी भीड़तंत्र के विश्वास पर अभी तमिलनाडु में मुख्यमंत्री का चुनाव भी संपन्न हुआ है। अरविंद केजरीवाल के सोनम वांगचुक को आगे करके लद्दाख और जंतर-मंतर के दोनों प्रयोग अब तक असफल सिद्ध हुए हैं। फिर भी वे लगातार इस मार्ग पर नए-नए प्रयोग करने की कोशिश कर रहे हैं।
अपने पूरे जीवन में नीतीश कुमार सफलतापूर्वक रिटायर हो रहे हैं। नरेंद्र मोदी भी अपने कार्य में सफल दिख रहे हैं। अरविंद केजरीवाल भी अपने तरीके से छटपटा रहे हैं। मुझे ऐसा लगता है कि लोकतंत्र में अरविंद केजरीवाल का मार्ग अधिक घातक है, भले ही कभी सफल हो जाए।
यदि हम तीनों को संक्षेप में परिभाषित करें, तो राहुल गांधी सबसे अधिक शरीफ माने जाते हैं, नरेंद्र मोदी सबसे अधिक समझदार माने जाते हैं और अरविंद केजरीवाल सबसे अधिक चालाक माने जाते हैं।
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